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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1301

संतोषबोध

( १६१ )

कैसे घटमें कीन पसारा । कौन अस्थल बैठक संवारा ॥
इतना भेद कहां समझाई । सतगुरु मैं तुम बलि जाई ॥

सद्गुरु उवाच

धर्मदास सुनियो चितलाई । जो बूझे सो देखै बताई ॥
पवनजीव ब्रह्माण्ड रहाई । ता पीछे नाभी चलजाई ॥
नयन नासिका कीना साखी । मूल कमल सुरति गहि राखी ॥
चक्षुज्योति जो बरै उजियारा । हिरदाकमल ब्रह्माण्ड मझारा ॥
जीव बैठे द्रौपन में जाई । काया क्षेत्रमें जाय समाई ॥
ता बिधि घटमें जीवहि आया । रज बीजहीते पिंड बँधाया ॥
शीश स्वारि बांही निर्माई । कंठ कमल हृदय बनाई ॥
ता ऊपर द्विपि बदन सवारा । पवनजीवसे भय उजियारा ॥
कमल सबज स्वेत है राता । नाभी सकल पुनि सब गाता ॥
ता पीछे दोय खम्भ लगाया । रचिकाया पुनि जीव समाया ॥
स्वाती पवन पुरुषकी स्वांसा । जिन कीना जीवन संग बासा ॥
ताको भेद सुना धर्मदासा । तौलि लेहु सत्ताइस मासा ॥
छिन छिन पलपल आवै भाई । जीव संधि लेखे नहि पाई ॥
प्रथम घडी ब्रह्माण्ड रहाई । दूजी घडी नाभी चल जाई ॥

साखी-तीजी घडीके बीतते, फिर तहँवा चलजाय ॥

अस बिधि रहनी जीवकी, कहै कबीर समझाय ॥

धर्मदास वचन चौपाई

जा बिधि जीव देहमें आया । सोई भेद हम निज कर पाया ॥
दयावंत प्रभु और बताई । छुटै हंस कौन दिशि जाई ॥
काया तजिकै होय न्हारा । कौन दिशा हंस पगुधारा ॥
तौन ठाम मोहि देहु बताई । तहां सुरति राखूं ठहराई ॥

नं. ८ कबीरसागर -