सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1297, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1297

संतोषबोध

( १५७ )

धर्मदास वचन

साहेब कहो भेद टकसारा । जेहिते जिवका होय उबारा ॥
नौ तत्त्वनको भेद बताओ । सकल कामना मोर मिटाओ ॥
पाँच तत्त्व जाने सब कोई । चारि तत्त्वकी खबरि न होई ॥
पाँच तत्त्व खेले मैदाना । चारि तत्त्व रहे कौन ठिकाना ॥
कहाँ तत्त्वनको भोजन केता । ताके चेत आगम है चेत ॥
इनका सतगुरु कहो बिचारा । कहो केता तत्त्व करै अहारा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं अगम बताऊँ । नौ तत्त्व को भेद लखाऊँ ॥
पाँच तत्त्व खेले मैदाना । चारि तत्त्व ब्रह्मांड ठिकाना ॥
छठवाँ अग्नि तत्त्व जो होई । नैना वीच रमै पुनि सोई ॥
दोयदल कमल वरणहै चारी । बैठे निरञ्जन आसन मारी ॥
ताहि कमलको नाम बताऊँ । चारि वरणका रूप दिखाऊँ ॥
लखै शब्दसो जाने भेदा । राता पीरा श्याम सपेदा ॥

साखी—ताहि कमलको छाड़िके, कीजै शब्द विचार ।
पाँच तत्त्व संभारिहो, उतरो भव जल पार ॥

चौपाई

निशि बासर की स्वांसा जेती । कहूँ विचार चले दम तेती ॥
छःसै स्वास इक्कीस हजार । येते निशिदिन दमहि सुधारा ॥
ताको भोजन सबमिलि पावे । जो सतगुरु यहि भेद बतावे ॥
बीस सहस्र पंच देव पाई । ताको लेखो कहूँ समुझाई ॥
प्रतिदेव पाछे चार हजार । रहै जाप सोलहसै सारा ॥
छठवें तत्त्व निरञ्जन राई । जाप सहस्र तहाँ पहुँचाई ॥
सोलहसै मैं छःसै रहई । ताको भेद हंस कोह गहई ॥
जाप अठोतर जब रहि जाई । ताछिन शब्द सुरति मिलाई ॥