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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1267

ज्ञानस्थितिबोध

( १२७ )

धर्मदास तब वचन प्रकाशा । आये इह कबीरकी आशा ॥
नाम संधि उन मोहि हटाई । तिहि प्रसाद सेवा तुम पाई ॥
आरतीकर परवाना पावा । काल फाँस सबहीय नशावा ॥
सुरति निरति भूल गये जब ही । भवसागरमों ठाढे तब ही ॥
साखी-लोक वेद सब भूलिहू, भूला आपनु भाव ।
बलिहारी सतगुरुनकी, जो ल्याये इहि ठाव ॥

चौपाई

तबहि सुजन जन पूछी बाता । कहिब कहा है हमरे आता ॥
तुमरे दीप माँहि वे ठाढे । हम पूरन उनहीके बाढे ॥
तब सुरजन जन आये तहँवा । आइ कबीर बैठे हैं जहँवा ॥
चरण लगाइ अंकमहँ लीन्हों । भले गुसाईं दर्शन दीन्हों ॥
सिंहासन साहब बैठारी । सुरजन हंस विराजे भारी ॥
आज्ञा साहब दीन्ही जबही । धर्मदास ठाढे भये तब ही ॥
पुरुषहि तबहि वचन उचारा । सुकृत अंश लावो सठिहारा ॥
आरति साजि हंस सब आये । चलिए सुकृत पुरुष बुलाये ॥
तब सुकृत चित आये तहँवा । पुहुपदीप पुरुष रहि जहँवा ॥
पुहुपदीप नहिं बरनो जाई । जगमगज्योति सदा अधिकई ॥
दामिनि दमक होय अति भारी । कोटिन भानु जाय तहाँ वारी ॥
हंस जाय तहाँ करै अनन्दा । कालजाल व्यापै नहिं फन्दा ॥
पंख बेहु नभचर तहाँ फिरही । अगिन बेहुते दीपक जरही ॥
बिन करताल मुदंग जो बाजे । चित्र विचित्र बीन कर छाजे ॥
बीना सुर तहाँ शब्द पुकारा । बीना श्रवण सुनत झनकारा ॥
बिना नालके कमल अन्तूपा । तामध्ये है पुरुष स्वरूपा ॥
करतहि दरश हरष उर आनी । सतगुरुवचन सत्य कर मानी ॥

साखी-अति अनंद उर ऊपजो, बाजत अनहद तूर ।

हीरा लाल मणि जग मगै, अमृत शोभा भरपूर ॥