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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1260

( १२० )

बोधसागर

धर्मदास जो पूछिब आई । सो अब कथा कहो समुझाई ॥
पुहुप द्रौप जहाँ पुरुष रहाई । अलोप दीप तासों कहि भाई ॥
आस पास है छविबस दीपा । तहाँ पुरुष रहै अधर समीपा ॥
तीन दीपनको नाम बखानों । धर्मदास मनमें बिलछानों ॥
अजर द्रौप पुरुषके पास । कुसुम दीप सतगुरु निवासा ॥
अमरदीप सुजन जन जाना । सुमन द्रौप अब कहौ बखाना ॥
सहस्र नेत्र द्रौप सुनि लीजे । अलोक द्रौप सुनिके चितदीजे ॥
कंचन दीप बखानों आई । कंचन दीप सुनो चितलाई ॥
सुरजन द्रौप कहौ सम्भारा । अजर द्रौप निर्मल उजियारा ॥
हेत द्रौप सुनियो चितलाई । लवंग द्रौप द्रौप अति छाई ॥
अबहि निरक्षर कहिये द्रौपा । कमल द्रौप तहाँ पुरुष समीपा ॥
अंबु द्रौप बहुत उजियारा । सुरति द्रौप अब कहौ पसारा ॥
भिरत द्रौप सोही जन जानै । निग्रह द्रौप करै पहिचानै ॥
श्वेतद्रौप समझो हो ज्ञानी । निश्चित द्रौपमें जाय समानी ॥
सुस्थिर द्रौप चित जो राखा । कीरति द्रौपकरे अभिलाषा ॥
अकृत द्रौप आहि उजियारा । अक्ष द्रौप मह शब्द पसारा ॥
द्रौपचंद्र मन कहौ अनन्दा । पतंग द्रौप उमगै रवि चन्दा ॥
कुरअ द्रौप धर्मनि लघु जानी । सताइस द्रौपके नाम बखानी ॥

साखी-इतने द्रौपक गुम हैं, कोइ न जानत नांव ।

कहैं कबीर धर्म दाससों, सोई ठांव लखाव ॥

चौपाई

धर्मदास तुम सबै बिचारा । सार शब्द नाहिं अनुसारा ॥
जब लगि सार शब्द नाहिं होई । तौ जिय केता जन्म बिगोई ॥
काम कपाल भोज बसु नारी । सो साधू जिन नाम सँभारी ॥