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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1250

( ११० )

बोधसागर

नागहि लोक इंद्र जो गयऊ । सुधा हेतु कारज तेहि ठयऊ ॥
डारेउ नाग फाँसते तबहीं । कौन छुड़ावे याते अबहीं ॥
नागदेवके मात रहीया । गरुड मातसोंहीं छल करिया ॥
माथे लीन्ह गरुड़की जीती । छलसों भई दयाकी रीती ॥
गरुड़ मात कहि वचन सुनाई । दासी भाव कहां तुम पाई ॥
तब उठि माता वचन उचारा । सुनो पुत्र एक भेद हमारा ॥
नाग मात मोहि वचन हरावा । यातें दासी भाव रहावा ॥
पीतबरण शशि हम कहि सोई । श्याम बरण उन करो विलोई ॥
यह छल जानि परा नहीं मोही । सुनो तात समुझावों तोही ॥
कोपि गरुड तब गये पताला । नागलोक जहाँ विषकी ज्वाला ॥
देखत गरुड नाग सब भागे । मातासो छल कीन्ह अभागे ॥
माँगो सो हम तुम कह देही । हम कहैं त्रास देव जिन एही ॥
गरुड अहिन तब वचन उचारा । अमृतकुण्ड देव सब धारा ॥
नाग आइ तब कीन्ह निहोरी । गरुड इंद्रकी बंधन छोरी ॥
अमृत लेइ दर्शनको गयऊ । नाग गरुड पहुँचावत भयऊ ॥
गरुड मात नाग जब देखा । दासहि भाव तजब तुम रेखा ॥
अमृत पाइ गरुड बरियाना । तब छल इंद्र गरुसों ठाना ॥
गरुड महाबल सुख लहलीन्हां । बोई बंबूर अमृत किमि चीन्हां ॥
ज्यों मलयागिरि निकट रहावा । तास्वरूप काहू नहीं पावा ॥
कूर्म उदरसे सो चलि आवा । सुधा समुद्र मथे तब पावा ॥
गुरु द्रोहसों जन्म बिगोई । नाम पाइ अस्थिर नहीं होई ॥
चंचरीक चंचल है बहई । मलयागिरिकी सुगँध न लहई ॥
मलयागिरिको यहि प्रकाशू । विष नहीं बेधे वास सुबासू ॥

साखी—मलयागिरिके वाससे, सब दुम होइ सुवास ।

बासन कबहुँ बेधही, सदा रहत है पास ॥