सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1245, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1245

ज्ञानस्थितिबोध

( १०६ )

मृतकहि देह धरे संसारा । बिना शब्द है काल अहारा ॥
स्नान शब्द हृदयमें धरहीं । जीवनमुक्ति होइ भव तरहीं ॥
यही शब्दसो धोवे अंगा । दिव्यदेह जानो परसंगा ॥
जो कोइ करे शब्द असनाना । ताकर धोखा जाय निदाना ॥
लक्षहि दान करै नर कोई । जीव दया बिन मुक्ति न होई ॥
जो धोवे निश्चय करि देहा । तबही कीजे शब्द सनेहा ॥
कहे शब्द अब कहो बखानी । धर्मदास लीजो शिर् मानी ॥
नित्य प्रीतिकर शब्द स्नाना । ताकर दोष न रहै निदाना ॥

स्मरण

साखी-अगम सरोवर विमल जल, हंस बैठिके न्हाइ ।

काया कंचन मनमगन, कर्म भर्म मिटि जाइ ॥

पिंडहिसों ब्रह्मांडहि जाना । मान सरोवर करि असनाना ॥
सोहं सोहं ताको जापा । लिखत न करै पुण्य औ पापा ॥
पुण्य पापसे रहत न न्यारा । पैठि संत जन करो विचारा ॥
याहीविधि जो करि असनाना । सो हंसा करै लोक पयाना ॥
धर्मदास सुन शब्द विशेषा । गंगवारु इतने है लेखा ॥

स्मरण सम्पूर्ण

आदि अंत सब कहों बखानी । धर्मदास कीजो बिलछानी ॥
मूलपुरुष काहू नहिं जाना । सो तुमसो सब कहों बखाना ॥
मूलशब्द तहाँ अग्र कहावा । अग्र विदेह अस्थूल सुभावा ॥
मूलभेद काहू नहिं पावा । मूलनाममें गुप्त छिपावा ॥
कहैं प्रतीत देखी मैं तोरी । तातैं कहों मूल निज डोरी ॥
मूलहि शब्द असंभव नामा । कहैं सुनै नहिं पावै ठाना ॥
चारलोक चार है नाऊँ । चार चार सो बरन सुनाऊँ ॥
सीख गुरु या बिचि जो धरहीं । जैसी विधि तुम हम सो करहीं ॥