कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1235, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्थितिबोध
( १६ )
रंग रेख कर्म उपराज् । सरवन सुरति वहे गुण छाज् ॥
योग संत इनको विरमाए । तिनको अंत न काहू पाए ॥
सुकृत अंश भये तेहि ठाऊँ । सोहँ सुरति अचित बनाऊँ ॥
आठ अंश ये उपजे भाई । ज्यों दर्पण प्रतिबिंब समाई ॥
पुरुष सहज सो भाषे लीना । दीप एक तुमहुँ कहँ दीना ॥
अंमो दीप प्रदीप निवासा । गर्भते कूर्म तहाँ परकाशा ॥
तबही पुरुष कूर्म उपराजा । बाहर पलंग रूप तेहि छाजा ॥
उपजे कूर्म पृथ्वीको भारा । सोरह पलंग दीप विस्तारा ॥
रचना सबहि कूर्मकह दीना । इहतो चरित सहज नहि चीन्हा ॥
साहब चरित लखे नहि कोई । सुरति पुत्र उपराजे सोई ॥
महा अपर्वल है अधिकारी । पुरुषके कहिये भण्डारी ॥
दया करी सुरतीको जबही । सुरति अंश उपराजे सबही ॥
साखी- ज्ञानस्थतिके यह गुण, सुरति कूर्म उपजाइ ।
कहै कबीरा नाम बिन, जीव अकारथ जाइ ॥
चौपाई
कूरम उदर बिदारी जबहीं । चारों अंड फूट गये तबहीं ॥
चारों अंड ब्रह्मांड सम्हारा । कृत्रिम वस्तु कीन्ह संसारा ॥
कर्ता आदिपुरुष कर नाऊ । सोई नाम निरंजन पाऊ ॥
फूटि अंड चौभंगा भयऊ । पाँचो तत्त्व तीन गुण ठयऊ ॥
पंच अमीसे सब संसारा । पंच अमीका है विस्तारा ॥
पंच अमीकर नाम न जाने । सो मन आन केल तन ठाने ॥
अमी दहे है सकल जहाना । अमी रंगसे कीन्ह ठिकाना ॥
अमी वस्तु जिनही पहिचाना । पंच अमीको सकल जहाना ॥
पंच अमीको नाम सुनाऊँ । भिन्न भिन्न सब तोहि बताऊँ ॥