कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1232, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ९२ )
बोधसागर
साखी-पानीमें सबउपजहि, पानि जान सब कोइ ।
जासों पानी ऊपजा, सो रँग कैसो होइ ॥
चौपाई
रंगहि रंग रंग उपजाया । एक रंगसे सब रँग आया ॥
बहुरंगीसे पानी भयऊ । पानी रंग नाद जो कियऊ ॥
नाद रंगसे वेद उचारा । वेद रंगसे भयो संसारा ॥
साखी-हीर डोरको भाव यह संत सुजाना देखि ।
कहै कबीर विचारिके रंगहि रंग विशेखि ॥
पुरुष डोर तुमसों कही, सुनो संत चित लाइ ।
धन्य भाग्य वह जीवके, ज्ञान स्थित जो पाइ ॥
चौपाई
सो सब तोहि कहिव चित लाई । परखि लेहु हियको समुझाई ॥
पांच तत्त्व जो प्रकटे आई । पांच तत्त्व वे गुणत रहाई ॥
सोह तत्त्व तुमको न सुनावा । हृदये भीतर गुप्त छिपावा ॥
कौन शब्दसे तत्त्व जो आऊ । सो अनुसार तोहि समुझाऊ ॥
विदेह तत्त्व अगरको मूला । सोम तत्त्व आही अस्थूला ॥
अनुम तत्त्व सब दीप बखानी । अनुप तत्त्व सब दीप बखानी ॥
अंकुर तत्त्वसों सब कछु कीन्हा । ताको मरम न काहू चीन्हा ॥
पाच तत्त्व प्रगटे दुनियाई । तामहँ जीव रहै अरुझाई ॥
आप तेज वायु तत्त्व बखानी । पृथ्वी अकाश देह सब जानी ॥
धर्मदास वचन
कौने तत्त्व सो रची है देही । कौन तत्त्व है फूल सनेही ॥
कौन तत्त्व सो देहमें आवा । कौन तत्त्व निज मूल कहावा ॥
सत्गुरु वचन
अजर तत्त्व निःस्वादी कहेऊ । पुढुपतत्त्व निजमूलहि लहेऊ ॥