कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानास्थितिबोध
( ८९ )
जब आवै बालकके पाहा । पलटे देह धरै निजु नाहा ॥
भक्तिरूप धरि आवै सोई । मस्तक श्याम फेर नहिं होई ॥
जब जिय नाम करै सम्भारा । तब यमकी जड़ होवे छारा ॥
शब्द सिंधुमें रहै समाई । तहांयम कबहु निकट नहिं आई ॥
शब्दविचार बारि टढ़ करहीं । मूल हंस रखवारी धरहीं ॥
जब फिर चाहे करन पयाना । अग्रज नाम करी संधाना ॥
साखी-वंश छांय बीरा लिखो, नाम सन्धि चित लाय ।
कहै कबीर निःशंक हो, हंस लोक कहैं जाय ॥
जब सठहार चले लै हंसा । सत सिंधु पहुँचत गइ संसा ॥
सत सिंधु आसन जो करहीं । हृदय रूप हंसा सब धरहीं ॥
आगे लेन हंस तहैं आवहि । आरति साजि चीर पहिरावहि ॥
कुशल क्षेम पूछे सब कोई । यमकी लज्जा किहि विधि खोई ॥
कहि प्रसाद आइ यदि ठाऊं । केहिं करनी पहुँची इहिं गंजि ॥
तबै हंस उठि बोले बैना । गुरुप्रसाद पाया निज नैना ॥
गुरु मोहि वह नाम सुनाई । तेहि प्रताप आये इहि ठाई ॥
तबही हंस पुरुष सौ कहई । हंसन चाह दर्शकी अहई ॥
साखी-नाम महात्म कबीरको, तेहि प्रसाद सो आइ ।
बिनय करत अभिलाष चित, पुरुषहि दरस कराइ ॥
चौपाई
पुरुष बुलाइ हंस कह लीन्हा । हंसन सकल डण्डवत कीन्हा ॥
दीन सिंहासन क्षत्र जु धरहीं । हंस सुजन जन दर्शन करहीं ॥
सिंहासन बैठी सुख पावा । शब्द अहार पुरुष संग आवा ॥
जन्म मरनकी भूख बुझाई । सब सुख भुगते अग्र अघाई ॥
निरंजन सुख सुधि नहिं पावा । ब्रह्मा विष्णु बैठि पछितावा ॥
वहतो हंस कहाँ उड़ि गयऊ । आदि अंत काहू नहिं लयहू ॥