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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1223

ज्ञानस्थितिबोध

( ८३ )

साखी-अब मैं कहब तोहि सों, ए चित करो विचार ।
कहै कबीर पुरुषको, यही रूप निज सार ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अग्रमूल बिदेह परकाशा ॥
इच्छा पुरुष काया बंधाना । लीलागर दीप कीन्ह अस्थाना ॥
सुजन हंस जन कीन्ह विश्रामा । धरै ध्यान पुरुषकर नामा ॥
तहैंवा पुरुष कीन्ह अस्थाना । अस्थल रूपको कहों ठिकाना ॥
कंठमाल पुढुपनकी राजे । माँथे प्रभुके छत्र विगजे ॥
हाथ अमी अंकूर बिचारी । जगर मगर शोभा उजियारी ॥
उपमा काकहि वरनों भाई । कोटि भानु सोजायैं लजाई ॥
भालरूप वरनन कहि कैसा । बीस सहस्र चंद्र लखि जैसा ॥
शरवन शोभा देहु बताई । रवि सहस्र तहाँ रहे लजाई ॥
चक्षु अमीकर चितवन कैसी । सुधा सिंधु लहरे उठ जैसी ॥
नासा श्रीवा कंठ कपोला । शोभा इनकी आइ अतोला ॥
मुखारविंद अरविंदहि जानी । उदय कोटि सूरजकी खानी ॥
उभय हंस अघरमो विहरे । दामिनि दशन उठत जनु लहरे ॥
भुजा बाँह मन चिकुर बनाई । हृदय राखि उर कलित लजाई ॥

साखी-कटि नाभि पिंडुरी जंघनि, नख सिख बहुत अनूप ।

झलझलात झलकत महा, शब्दहि रूप सुरूप ॥

चौपाई

निगम नेति नेतिहि करिधावे । तिनको रूप बरन को पावै ॥
मन बुधि चित पहुँचे नहिं तहाँ । अबरण पुरुष विराजे जहाँ ॥
जहाँ लों निजमन दर्शन पावा । तहाँ लंगि वरणि कबीर सुनावा ॥
अगम अगाय गाधमो नाही । ज्योंके त्यों प्रभु सदा रहाहीं ॥
अग्र नाम पुरुषके बरणी । भवसागरकी है यह तरणी ॥