कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1192, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५२ )
बोधसागर
करि अभिमान आपको जानै । और न दूसर चितमें आनै ॥
क्रोध सदा अभि अन्तर राखै । बहु कठोर कोमल नहिं भाखै॥
रहै अज्ञान ज्ञान नहिं भावै । जहां ज्ञान तहैं रोष उठावै ॥
प्रवृत्ति निवृत्ति पुण्य औ पापा । कर्म धर्म करि थापैं आपा ॥
शौच किया मानै नहिं आवै । निराचारमें मन चित लावै ॥
जत्नके अस्त सदा सुख मानै । जग कर्ताको कबहि न मानै ॥
यह व्यवहार आसुरी आही । कबहु न सुमिरे प्रभु जो ताही॥
ऐसे जीव सदा दुख पावै । नरक वास में जाइ समावै ॥
नर्क द्वार तीन हैं भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥
तीन द्वार नर्कको वर्णन
प्रथम द्वार जो काम बनावा । काम द्वारलै चित्त लगावा ॥
कामविषय निशिदिन लपटाना । नर्क वासमें जाइ समाना ॥
दूसर द्वार क्रोध कहावै । जाके क्रोध सदा चित भावै ॥
ताते नर्कवास में जाई । उपजत विनशत बहु दुख पाई॥
तीसर द्वार लोभ है भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥
लोभ लागि जो जन्म गवाई । वासा नर्क सदा सो पावै ॥
नर्क द्वार यह तीन बखाना । मूरख इनमें रहै समाना ॥
दैव आसुरी संपद नामा । अध्याय षोडशो कहेउँ बखाना॥
कवीर उवाच
कहै कवीर सुनु संत विवेकी । दोउ संपदा कहेउँ विशेषी ॥
पाप पुण्य हैं दोऊ बेरी । एक लोहे एक कंचन केरी ॥
बेरी पाय एक दुख होई । कंचन ते सुख अधिक न सोई॥
यह संसार फंद यम केरा । कैसे छूटै यम उर झेरा ॥
कर्म करै कर्ता न कहावे । पाप पुण्य शिर भार लेयावे ॥
सत संतोष हियेमें धरई । सहज सरूपी भवजल तरई ॥