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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1178

( ३८ )

बोधसागर

रूप देखावहु श्याम सरूपा । वेगि छिपावहु काल सरूपा ॥
मेरो जीव न धीरज धरई । अबहीं जानौ भक्षण करई ॥
दया रूप अपनो दिखलावो । चित वित मेरो ठौर मिलावो ॥
ना तौ चित वित मेरो जाई । कैसहु धीरज मोहि न आई ॥
कालरूप तब लीन्ह सकेली । कृष्ण रूप धरि तब ही खेली ॥
शंख चक्र गदाधर जानी । मोर मुकुट पीताम्बर तानी ॥
विश्वरूप सम्पूर्ण भयञ्ज । अध्यायएकादश लगि कहञ्ज ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । कर कैसे यह काल तमाशा ॥
यह जग अन्धा उलटी रीती । अंधा मोल न फूटि मसीती ॥
अंधरे पंडित पढ़े पुराना । पढ़ि पढ़ि काहूँ भेद न जाना ॥
कृष्णजो निजमुख गीताभाषा । काल स्वरूप देखायउ आखा ॥
तबहुँ न मूरख कालहि चीन्हे । ज्ञान हीन है मतिके हीने ॥
ज्ञान अगम मैं बहुत पुकारा । सब झूठे मिलि कहै लबारा ॥
मूरख सांच झूठ नहि जाना । कैसे गुरु भेद पहिचाना ॥
भेद विना सो जन्म गवांवा । बार बार भग द्वारे आवा ॥
आवत जात महा दुख होई । जन्म बहुत धरि जाइ विगोई ॥
सतगुरु शब्द चीन्ह जो पावै । अजर अमर घर हंसा पावै ॥
धर्मदास सम हंस सुजाना । झूठो सत्य लेहु पहिचाना ॥
सांच झूठ में रहा छिपाई । चीन्हो ताहि गहौ चित लाई ॥
झूठे त्यागि सांच कह लागो । सत्य सुकृतमें तन मन पागो ॥
सत्यहिते जिव उत्तै पारा । सत्य शब्द जियको कड़हारा ॥
सत्य गहै सत्ये मुख भाखै । अभ्यन्तर सत्यहि गहि राखै ॥
सत्ये कर्म धर्म तुम करहु । कर्म भर्म दोऊ परिहरहु ॥
सत्य व्यवहार सत्य मुख बैना । सत्य है लेन सत्य है देना ॥