सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1165, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1165

उग्रगीता

( २६ )

जिन्है सतगुरु शब्द मिलिया अमी सो हंसा पिया ।
अजर अमर शरीर पायो बास सुख सागर लिया ॥
सोरठा-संत करो विवेक, शब्द सार गहु बूझिकै ।
सुरति निरति सो देख, सतगुरु शब्द अपार जो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

कृष्ण कहैं अर्जुन सुनि लीजै । भक्ति हमारी मन चित दीजै ॥
सतये अध्याय जो तुमसों कहउँ । भक्तनमें हितकारी रहउँ ॥
मैं ही करौं करावौं भाई । तीनि लोक जहँ लगि निर्माई ॥
मैं संधारौं मैं प्रतिपारौं । चौदह भुवन पलकमें टारौं ॥
जहँ लगि पशु पक्षी जिव होई । मैं सबही मैं रहौं समोई ॥
दानपुण्य आदिक सब माहीं । बनज व्यापार करै सब पाहीं ॥
देवी देव सकलौं मैं सब ही । भवसागर सकलौं जग हम ही ॥
तीनि लोकमें विजय मैं सारौं । जब चाहौं तब बेर संधारौं ॥
करौं संधार सृष्टि पुनि सोई । रहौं अलेप निरंजन होई ॥
सगुणते निर्गुण मैं होइ जाऊं । फिर चाहौं सगुण होइ जाऊं ॥
सगुण औ निर्गुण रूप हमारा । जहिंते सृष्टि रच्यो व्यवहारा ॥
अर्जुन सबमें मोही जानो । कहा हमारा निजकै मानो ॥
चारि प्रकार भक्ति जो होई । तामें ज्ञानी अधिक सो होई ॥
रोग दुःखमें भक्ति जो करई । दुख कारण जो मोहि सुमिरई ॥
दीन दुखी निशिदिन लव लावै । कब प्रभु मोकहैं भोग भोगावै ॥
द्रव्य चहै जो द्रव्यहि स्वारथ । ज्ञानी चाहै मुक्ति पदारथ ॥