सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1163, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1163

उग्रगीता

( २३ )

साधै निद्रा हार व्यवहारा । बहुत न मूदे नैन उघारा ॥
संयम कै सो साधन करई । सो साधू आपहि निस्तरई ॥
मन कह ज्ञान ध्यान में राखै । सुरति निरति सो अमृत चाखै ॥
जो मन अन्त न धावा चाहे । घेरि घेरि अभ्यन्तर बाहे ॥
तब अर्जुन अस पूछन लागे । यह मन चञ्चल पल पल भागे ॥
यह तौ काहू जाइ न पकरा । कौन उपाय जाइ मन जकरा ॥
गगन वाइ जो गर्जत आवै । कैसे गगरी माहि समावे ॥
यहि विधि मन चञ्चल यह भाई । तौ कैसे यह पकरन पाई ॥

श्रीभगवानुवाच

कृष्ण अर्जुन सो कहेउ बुझाई । ऐसे चञ्चल अस्थिर भाई ॥
जो यह मनको साधन करई । अभ्यन्तर लै फिरि २ धरई ॥
चारों दिशा चलन नहि पावै । जबै चलै तब माह समावे ॥
पारब्रह्म देखै तब नेता । दोई अनन्द परम सुख चैता ॥
दीन दुखित कह दाया करई । अपनासा दुख चितमें धरई ॥
दया भावसो हितकर बोले । तूस करै साधुन कह सो ले ॥
परका दुःख नेवारै सोई । ऐसी भक्ति परम गति होई ॥

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहै सुनु कृष्ण सुरारी । तारण तरण भक्त हितकारी ॥
ऐसा साधु कोइ ना देखा । आपनसा दुख सब कहपेखा ॥
आपन सुख चाहे सब कोई । औरन दुःख होय सो होई ॥

श्रीभगवानुवाच

अर्जुन जो है परम सनेही । आप निकरि नहि जानहिदेही ॥
पर सुख कारण आपु निरासा । दुख सुख देखै सकल तमाशा ॥
भक्ति करै जो मन चित लाई । ताते परम पदहि में जाई ॥
निर्गुण साधु जो पूर्ण ज्ञानी । ताकी महिमा वेद बखानी ॥
वेद पुराण ते अधिक है सोई । ताकी पटतर वेद न होई ॥