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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1161

उग्रगीता

( २१ )

रोवै बहुत भांति तेहि कारण । सुये न जीवै बहुत पुकारण ॥
प्रभु हिरदय नहिं सूरख जाने । मृतक आशा लागि भुलाने ॥
मृतक रोवैं भला न मानै । फिर यमराजा संकट ठानै ॥
लोगन घरतै बाहर कीन्हा । की जारै की माटी दीन्हा ॥
मृतक रूप बनी यह देही । करि ले प्रीतम प्रेम सनेही ॥
जगके बन्धन जगमें छूटै । बहुत त्रास तेहि यम धरि लूटै ॥
इन मों कहा मोह चितलाया । प्रभु इच्छा नहिं सूरख पाया ॥
काकर पिता पुत्रको होई । नारी सुत हित लागे सोई ॥
ता कारण यह दुख सुख मानै । अज्ञानी नहिं प्रभुको जाने ॥
कबहु न सुमिरण प्रभुका करई । निशिदिन ज्ञान ध्यान परिहरई ॥
ताते बहुत भांति दुख पावै । प्रभुकी शरण न कैसेहु आवै ॥
यह तौ लक्षण जग व्यवहारा । ताते बूड़े मूढ गवौरा ॥
अर्जुन कर्म योग है नीका । संशय मेटो सकलौ जीका ॥
कर्म करै शिर अपने लेई । कारण करतामें चित देई ॥
आपन कर्म धर्म नहिं छोडै । दुख सुख प्रभु इच्छा शिर वोडै ॥
सदा अनन्द रहै सुख बासा । अन्तकाल वैकुंठ निवासा ॥
क्षत्रिय धर्म तोहार जौ होई । करौ संहार शत्रु पुनि सोई ॥
तुम्हारे लरे सबै कोइ लगि हैं । ना तो निंदा तुम्हरी करि हैं ॥
धर्म छांड़ि जनि पातक लेहू । युद्ध करनको मन चित देहू ॥
कर्म संन्यास पञ्च अध्यायी । अर्जुन सुनि मन दुविधा आयी ॥
युद्ध करो की ज्ञान विचारौ । केहि विधि अपनो जीव उबारौ ॥

कबीर उवाच

धर्मदास यह काल तमासा । तासो चाहै मुक्ति निवासा ॥
ज्ञानी अज्ञानी भरमावै । धर्म अधर्म दोष ठहरावै ॥
धर्म अधर्म काल की पाशा । ताते न्यारा शब्द प्रकाशा ॥
कर्म अकर्म मध्य है सोई । तुम जाने जाने सब कोई ॥