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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1151

उग्रगीता

( ११ )

क्षत्री धर्म कर्म बहु करई । स्नान करै प्रभुको चित्त धरई ॥
यज्ञदान निज धर्म निवाहै । सूरानन नहिं दलहि सकाहै ॥
वैश्यवर्ण व्यापार व्योहारा । नेम धर्म जप तप व्रत धारा ॥
शूद्र वर्ण सेवकाई करई । मन वच कर्म इहै चित्त धरई ॥
सेवा फल है अगम अपारा । आवागमन ते होइ नियारा ॥
एते कुलके धर्म जो कहिये । सदा सर्वदा जो निर्वहिये ॥
यह मारग जो लागा रहई । स्वर्ग वासमें सो सुख लहई ॥
मारग छाँड़ि कुमारग लगै । काम कोधमें तन मन पागै ॥
नर्कवास तेहि कारण पावै । जन्म २ वह योनी आवै ॥
निंदा सकल ताहिकी करई । वाउर वेद ताहि परिहरई ॥
ताते अर्जुन ज्ञान विचारो । ब्रह्म ज्ञान मनमें संभारो ॥
मोह लाजकै वंदन छांड़ो । लैकै अक्ष कुटुम सब वाड़ो ॥
तुम कह पाप पुण्य नहिं होई । कारण करण करावै सोई ॥
साधु संत जो परम सनेही । पाप पुण्यते लिप्त न देही ॥

अर्जुन उवाच

कहैं अर्जुन सुनु पुरुष पुराणा । तिन साधुन कर करौ बखाना ॥
कैसी रहनि रहै वै बोलैं । कैसे बैठै कैसे डोलैं ॥
बोले कृष्ण तब चतुर सुजाना । यहि विधि रहै साधु निर्वाना ॥
स्थिर मन बुद्धि निहकामी होई । पांच पचीसौ रहें समोई ॥
बोले सत्य असत्य न भारै । अभ्यन्तर गति प्रभु कह राखै ॥
सो तो कह दुख सुख नाहिं मानै । दृष्टि माह प्रभु पूर्ण जानै ॥
तत्त्व प्रकृति चापि करि बैठै । जैसे कछुआ पाउ समेटै ॥
सीतल सत्य सहज पगु धारै । बाहर भीतर ब्रह्म निहारै ॥
यह लक्षण संगति कै भाई । इंद्री जीतै साधु कहाई ॥
पूर्ण पक्ष जो अर्जुन करेऊ । रोगी मूर्ख भाव जो धरेऊ ॥