कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1138, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( २७० )
अमरमूल
एही तें है सकल पसारा । याहीतें है सब व्यवहारा ॥
आतम राम चीन्ह जब पावा । सकल पसारा मेट बहावा ॥
आतम परमातम मिल जाई । जैसे सरिता सिन्धु समाई ॥
जब लग यह चीन्हें नहिं आतमा । तब लग नहिं मिलि है परमातम ॥
शब्द बिना आतम दृग हीना । सद्गुरु संघ यही कहि दीना ॥
शब्द नेत्र जबही लख पावा । सद्गुरु मिलनिज घरहि सिधावा ॥
ऐसी मति जाही घट होई । हंस हिरंमर कहिये सोई ॥
तिन कहैं जानहु हमहिं स्वभाऊ । हमहुँ नहीं कछु ताहिं दुराऊ ॥
धर्मदास यह बूझहु ज्ञाना । जातें हंस होय निर्वाना ॥
जा कहैं आतम ज्ञान प्रकाशा । वही कबीर वही धर्मदासा ॥
आतम राम देख जिन पाई । आप आप सब ठांव समाई ॥
जब देखा तब आप समाना । ब्रह्म छोड़ दूसर नहिं आना ॥
सोहं सोहं सत्य कबीरा । शब्द मंत्र है प्रकट शरीरा ॥
यहां ग्रंथ मैं मंत्र सुनावा । चारहि वेदका मूल बतावा ॥
षटे शास्त्र मिलकरहिं विचारा । प्रकट ब्रह्म यह ज्ञान विचारा ॥
साखी- ऐसा ज्ञान जब ऊपजै, सुनहु हो धर्मदास ।
परकट ब्रह्म स्वरूप है, एक नाम विश्वास ॥
चौपाई
यहै ग्रंथ सब सुनै सुनावै । निश्चय प्रेम भक्ति को पावै ॥
जो ज्ञानी है बूझे ज्ञाना । निश्चय है है ब्रह्म समाना ॥
चार पदार्थ को फल होई । निश्चय जानहु यहमत सोई ॥
ऐसो ज्ञान अखंडित भारी । अमरमूल मैं कहेऊँ बिचारी ॥
साखी-अमरमूल यह ग्रंथ है, सकल ज्ञान भंडार ।
मुनत अमर पद पावहीं, कहैं कबीर विचार ॥