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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1130

( २६२ )

अमरभूल

चौपाई

नहीं कबीर नहीं धर्मदासा । अक्षर एक सकल घट वासा ॥
सत्य पुरुष वाही सों कहिये । आदि अन्त अक्षर गह रहिये ॥
अक्षर मूल और सब डारा । शाख रमैनी पत्र पसारा ॥
कथा जोकहि-कहि ज्ञान सुनावा । यही भांति संसार बुझावा ॥
जिन बूझा तिन धोखा माना । सकल बात मिथ्याकर जाना ॥

सारखी— कहै कबीर यह मनहि है, मतका सकल पसार ।

चिन्ह यह मन कहै बूझिया, आवागमन निवार ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास विनती करजोरी । बंदिछोर सुन विन्ती मोरी ॥
निश्चय जान मोहिं समुझायो । निश्चय सकल हमतुमसों पायो ॥
सो यह बात अब बूझों साई । सो साहिब मोहिं देहु बताई ॥
आवागमन कवन विधि होई । बन्दी छोर सुनावहु सोई ॥

श्रीसाहिब कबीर वचन

तब साहिब कहिबे अनुसारा । कहौं विचार तासु व्यवहारा ॥
पांच तत्त्वका पुतरा बनावा । तामहँ परगट आप समावा ॥
त्रिगुण आतमा रूप बनाई । दुख सुख ताहि सबै भुगताई ॥
इन मँ मन राजा कर दीन्हा । ताते जीव बुद्धि गह लीन्हा ॥
आपन रूप आपनहिं चीन्हा । ताते आवागमन कर लीन्हा ॥
ना कोइ आया ना कोई गया । मनके मते जन्मतें भया ॥
मनही ज्ञानी मूरख कहिये । मनही ब्रह्मरूप यह लहिये ॥
मनका है यह सकल पसारा । मनही पाप पुण्य बिस्तारा ॥
मनही मोह काम उपजावै । मनही आशा तृष्णा लावै ॥