कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1126, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( २५८ )
अमरमूल
धर्मदास वचन
धर्मदास कहैं सुनो गुसाईं । मुक्ति वस्तु सो मोहि सुनाईं ॥
तुम तौ मुक्ति भर्म कर डारा । तुमते पायँउ ज्ञान भंडारा ॥
मुक्ति करौ जो बन्धा होई । यह तौ हंस निबन्धक सोई ॥
नहिं कोई बन्धा नहिं कोइ छूटा । संशयके बस सब जग लूटा ॥
तुम्हरी दाय़ा सो हम जाना । मुक्ति अमुक्ति दोउ भर्माना ॥
सद्गुरु उवाच
अब तुम्हारे जिव निश्चय आई । हम जाना तुम सिखहौ भाई ॥
निज मन्त्रहि जानहु धर्मदासा । अब कह बूझहु सत्त विलासा ॥
जो कहिये सो वचन विलासा । यह तौ साखी पद परकासा ॥
ग्रन्थ कहेउ सब जगत प्रबोधा । जो बूझे सो पावै सोधा ॥
जो बूझे ग्रन्थनकी वानी । तब पावै गम निज सहिदानी ॥
जब पावै शब्दहि कर लेखा । तब जानहु जैसे सब धोखा ॥
धोखा योग यज्ञ तप कीन्हा । धोखा दान पुण्य सब लीन्हा ॥
धोखा कर्म करे संसारा । धोखा कोटिन ज्ञान पसारा ॥
धोखा पुरान सकल जहाना । धोखा शास्त्र वेद मत ठाना ॥
धोखा साखी पद है भाई । धोखा कह सब ज्ञान हुनाई ॥
धोखा प्रथम सांच कर माना । समझे धोखा सबै नसाना ॥
जस निर्गुण तस सर्गुण माना । निर्गुण सर्गुण एक समाना ॥
अगुण सगुण दोनों मिट गयऊ । आदिब्रह्म सौ परिचय भयऊ ॥
धर्मदास यह मति सुनि लेहू । धोखा ज्ञान चित्त मत देहू ॥
प्रथमहि भक्त रूपकर ज्ञाना । ता पीछे फिर तत्त्व समाना ॥
जबही तत्त्व समाना भाई । तबही जीव लोक कहैं जाई ॥
जबही सत्त्व हदैं महैं आवै । धोखा रूप सबै मिट जावै ॥
जब तुम अपना तत्त्वहि जानौ । गुरु औ शिष्य दोउ पहिचानौ ॥