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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1124

( २५६ )

अमरमूल

आपहि तीर्थ आपहि देवा । आपहि आप लगावै सेवा ॥
आपहि मूरत पिंड बैधावै । आप जन्त्र है जन्तर लावै ॥
आपहि महिमा सबकी कीन्हा । आपहि निन्दक मिथ्या कीन्हा ॥
साखी-आप सकल जग व्यापिया, आपहि अलख अपार ।
आपहि जग उपजावही, आपहि दस औतार ॥

चौपाई

आपहि देव दैत्य संहारा । आप युद्ध कीन्ह असरारा ॥
आपहि महाभार्थ करवाया । पांडौको शुभ ज्ञान सुनाया ॥
आपहि कौरव पांडव भयऊ । आपहि होय सबनसौं कियऊ ॥
आपहि है अहंकार स्वरूपा । आपहि रय्यत आपहि भूपा ॥
आपहि चाकर हो सेवा लावा । आप पंडित हो वेद पढ़ावा ॥
आपहि भला बुरा अनुसारा । आप अमीर न्याव निर्बारा ॥
आप ले आवै आपहि खाई । आप अतीत आप सिवकाई ॥
आपहि न्याव आपहि बादा । आपहि तीता आपहि वादा ॥
आपहि खाटा मीठा भयऊ । आपहि सर्वस्वाद कर लयऊ ॥
आपहि लघु दीरघ हो देखा । आपहि दूर निकट हो लेखा ॥
आपहि सकलौ वेद पुराना । आपहि पोथी आप बखाना ॥
आपहि छऊ शास्त्र बनावा । वाद विवाद कर ज्ञान सुनावा ॥
आपहि जीत आपही हारा । आपहि तरे आपही तारा ॥

साखी-ऐसी महिमा ब्रह्मकी कहत कही नहिं जाय ।
जो कोइ यह मति समझ है, तेही ब्रह्म समय ॥

चौपाई

ब्रह्म अखण्ड खण्ड नहिं होई । खंडित ब्रह्म ध्यावे सब कोई ॥
आप कहैं है ब्रह्म अखंडा । आपहि खंडित कह सबखंडा ॥
आपहि मनुष्य रूप कहावै । आपहि दूजा भाव स्वभावै ॥