कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २४९ )
जो कोई शब्दका खोजी होई । ता कहँ भेद बतावहु सोई ॥
इक मन इक चिन जाकर होई । ना कह ज्ञान न भापहु सोई ॥
दुतिया मन जाही कर भाई । तासों राखो भेद छिपाई ॥
जो गुरु सों कोई अन्तर राखा । धर्मराय सुगदर सोइ चाखा ॥
साखी-गुरुकी महिमा अगम है, अकह कही नहिं जाय ।
गुरु पद रज हियमें धरै, सत्यलोक कहँ जाय ॥
चौपाई
सत्यलोक सतगुरुकौ बासा । ब्रह्म कीन्ह गुरु मांहि निवासा ॥
गुरुके चरण रहै लवलार्ई । ताकी महिमा वर्णि न जाई ॥
गुरु औ शब्द एक कर जाना । ताकी त्रास धर्म भय माना ॥
जो कोई यह भेद न जानै । धर्मराय ता कहँ सन्मानै ॥
आतम ज्ञान जाहि कहँ होई । ताकौ काल न चापै कोई ॥
ऐसी धरण धरौ धर्मदासू । भवसागर तैं होउ उदासू ॥
सकल पसारा शून्य समाना । शून्यहि माहीं शब्द बखाना ॥
शून्य शिखरकी डोरी पावै । देह छोड़ सतलोक सिधावै ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनौ गुसाई । आतम ज्ञान गम्य नहिं पाई ॥
आतम ज्ञान मोहि समुझाऊ । जासों सकल हंस मुक्ताऊ ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास यह मता अपारा । ताकर जो मैं कहौ विचारा ॥
तब साहिब दया चितलाई । आतम ज्ञान तुम्हैं समुझाई ॥
गम्य अगम्य ज्ञान जब पावे । आतम ज्ञान तब घटहि समावे ॥
सत्य शब्द जब रहै समाई । सबही ठाम लोक है भाई ॥
शत्रु मित्र एकहि कर जाना । सांच झूठ एकहि कर माना ॥
सांच झूठ दोनों मिट गयऊ । दिव्य ज्ञान जाके घट भयऊ ॥