कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1115, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २४७ )
सद्गुरु वचन
तब साहिब बोले बिहसाई । अब यह ज्ञान सुनौ मन लाई॥
जब नहिं हते शून्य बे शून्या । तब नहिं हते पाप औ पुन्या॥
तब नहिं धरती गगन अकाशा । मेरे मन्दर नाहीं कैलाशा ॥
तब नहिं चन्द्र सूर्य औतारा । तब नहिं शेष सकलविस्तारा॥
तब नहिं इन्द्र कुबेर समोई । वायु वरुण तहैंवां नहिं कोई ॥
सात वार पन्द्रह तिथि नाहीं । आदि अंत नहिं कालकी छाहीं॥
तब नहिं ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि भवानी गौरि गणेशा॥
आदि पुरुष तब हते अकेला । उनके संग हता नहिं चेला ॥
आप पुरुष अस कीन्हौ साजा । शब्दहि माहि लोक उपराजा॥
प्रथमहि शब्द सुरत अनुसारा । तेहि पीछे सब द्रौप सवौरा ॥
तेहि पीछे पुन मूल बनावा । तेहि पीछे सोहं उपजावा ॥
ता पीछे अचिन्त जो कीन्हा । ते पीछे अक्षर रच लीन्हा ॥
ता पीछे कूर्महि निर्मयऊ । ताहि भार पृथ्वीको दयऊ ॥
तब जल रंग सूरत इस भाखा । सप्त पातालके नीचे राखा ॥
जिह्वितै भयो जलको विस्तारा । सकल सृष्टि कौ भयो पसारा॥
तिहि तैं तेज तत्त्व अनुसार । जेहिं गुण तैं काल औतारा ॥
पांच तत्त्वतैं सब निर्मावा । तीनों गुण तिहि माहि समावा॥
तीनों गुण स्वरूपके धामा । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर नामा ॥
रज गुण तैं ब्रह्मा उत्पानी । सतगुरु भाव विष्णु कर जानी॥
तमगुण शिव संहार पसारा । इतने भयो सकल संसारा ॥
तेजके गुणहि काल उत्पानी । तासों भये जीव दुखदानी ॥
तातैं पुरुष दया चित आई । हंसन कारण मोहिं पठाई ॥
यातैं मृत्यु लोकहि आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥
तुम जीवनकैं बन्द बुझाये । सुमरन सत्य नाम समुझाये ॥