कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अमरमूल
सप्तमविश्राम
धर्मदास बचन चौपाई
धर्मदास कहे कर जोरी । स्वामी सुनये विन्ती मोरी ॥
जो तुम कही सोई परवाना । गुरुके वचन सत्य हम जाना ॥
हम जानी पुरुष रु गुरु माहीं । तुमहिं पुरुष कुछ अंतर नाही ॥
हमरे दिल यह पारख आई । तुम्हरी दया हंस मुक्ताई ॥
हमरे बालक तुम्हरे पाछे । तुम्हरी दया नाम मिल आछे ॥
सद्गुरु वचन
तब साहिब अस कहि समुझाई । वंश तुम्हार मुक्ति घर जाई ॥
जो कोइ बालक होय तुम्हारा । तिनसों भक्ति होय उजियारा ॥
पंथ माहिं जे बालक आवैं । ते तुम वंशन माथ नवावैं ॥
तिनसों भक्ति मर्यादा होई । सार शब्द चलि है निज सोई ॥
नाँद केरि बालक जो होई । तिनको मुक्ति नाम सो सोई ॥
नाँदके बालक शब्दहि जाना । भवसागर तज लोक पयाना ॥
विन्दके बाल रहैं अरुझाई । मान गुमान और प्रभुताई ॥
सत्य शब्द जिहि बालक जानी । सोई पावैं लोक सहिदानी ॥
जेहो बाल प्रवाना पावा । तिन कहैं जानहु वंश स्वभावा ॥
साखी-हमरे बालक नामके, और सकल सब झूठ ।
सत्य शब्द कहैं जानही, काल गहे नहिं खूंट ॥
चौपाई
धर्मदास सुन शब्द पसारा । बिना शब्द नहिं उतरहि पारा ॥
बिना शब्द तुम मुक्ति न पाओ । केतो ज्ञान गम्य फैलाओ ॥
वंश हमार शब्द निज जाना । बिना शब्द नहि वंशहि माना ॥
धर्मदास निर्मोह हिय गेहू । वंशकी चिन्ता छांड़ तुम देहू ॥
तुम तो भयऊ शब्द समाना । यही बचन तुम चित नहिं आना ॥