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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( १०१ )

सुरति सनेही गुरु की दाय्या । हंस सुख बहुते मन भाया ॥
पुढुप द्रौप ताको विस्तारा । चार करी केता उजियारा ॥
प्रथमहि महिमा जोत विस्तारा । बैठे जिन कहैं जोत अपारा ॥
नौसै संख औ तेरा करोरी । एतिक महिमा द्रौपहि केरी ॥
ता भीतर करी कस देखा । महिमा फल जस रवि को रेखा ॥
अस जनि जानो रवि को भाऊ । उत्तपक्षा सब भाव बताऊ ॥
अम्बू करी बहुते उजियारा । धन्य पुरुष जिन शब्द उचारा ॥

सारखी-इतना भाव सुख उपजै, अम्बुकरी महाँ जाय ॥
नाम तत्त्व जो राघे, सो अस्थिर बैठे आय ॥

चौपाई

शुभ करी किम करौ प्रवाना । जातै कूर्म काल उत्पाना ॥
पक्षि पालना द्रौप बत्तीसा । तापर रूप सूर्य पञ्चीसा ॥
इक दिन मनो सूर्य की पांती । दुविधा भाव न रूप की कांती ॥
बरणों सूरज ज्योति अपारा । सोहै अटल रूप उजियारा ॥
औ सब शुभ करी को भाऊ । सब उजियार पुरुष से आऊ ॥
सिन्धु मध्य मेघ जस भरई । पुरुष शब्द ज्योति अनुसरई ॥
जस जीव रहै विषय की आशा । शब्द पुरुष सत करे निवासा ॥
प्रथम करी का मर्म न जाना । सो पुनि कैसे जाइ ठिकाना ॥
दूसर द्रौप मम महा सुरंगा । परम हंस बैठे तिन संगा ॥
तीसर द्रौप जोगा जहाँ रहई । ताहि द्रौप का मरम ना लहई ॥
आदि द्रौप पुरुष अस्थाना । तहाँ हिरंमर सुख कर थाना ॥

सारखी-पक्षि पालना द्रौप बड़, जामें ज्योति सुरंग ॥
नाम तत्त्व जो राघे, तो मेटे दुख द्रन्द ॥

चौपाई

मूल द्रौप मूल नाम उचारा । तातें अग्र बीरा निज सारा ॥
मूल अग्र बीरा निज पावै । इकोतरसौ जीव लोक सिधौवै ॥
शोक भरे काया नहि छाजा । शोभा हीन हंस होय लाजा ॥