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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1106

( २३८ )

अमरमूल

ज्ञान रूप कहे सों कहिये । ज्ञान भेद कैसे के लहिये ॥
बिन सतगुरु को भेद बतावे । किहिविधि मनकी संशय जावे ॥

सद्गुरु वचन

ज्ञान शब्द सत गुरुसों पावे । बिन सतगुरु को भेद बतावे ॥
ज्ञान नाम है बीज स्वरूपा । विना ज्ञान सो यह को रूपा ॥
ज्ञान बीज प्रथम अनुसारा । ज्ञान बीजतैं सकल पसारा ॥
ज्ञान बीज सों द्रीप निर्माया । अभी अंकूर ज्ञान उपजाया ॥
प्रथमहि तहां पुरुष को मूला । जिहि तैं भये सकल स्थूला ॥
सोलह सुत जबभय उतपानी । ज्ञान बीज तैं सबकी खानी ॥
तुम सहज धर्मबल जोरा । धर्मराय को माथा तोरा ॥
सुतनाम ज्ञानी अनुसारा । धर्मलोक तैं दीन्ह निकारा ॥
विषम सरोवर आन विराजा । अति अहँकार महाबल गाजा ॥
भाँति भाँतिके बाजन बाजा । रंग छत्तीसों होत अवाजा ॥
पाँच तत्त्व गुण तीन बनाया । तातैं सकल सृष्टि निर्माया ॥
जात पाँच यहि तैं उतपानी । ब्राह्मण क्षत्री शूद्र बखानी ॥
ब्रह्मासों जब जाति पसारा । चार वर्ण कीन्है निरधारा ॥
मुखसों ब्राह्मण कीन्ह उचारा । भुज सों क्षत्री कीन्ह पसारा ॥
जंघसों वैश्य करी उतपानी । पाँव सो शूद्र कीन्ह सहिदानी ॥
चार वर्ण को सकल पसारा । वर्तमान वतैं संसारा ॥
ब्राह्मण धर्म ब्रह्मको जाना । तातैं ब्राह्मण वेद बखाना ॥
ब्राह्मण जानौ शूद्र समाना । बिन जाने बूढ़े अभिमाना ॥
गायत्री जप हैं दिनराती । समुझत नहीं ज्ञानकी पाँती ॥
गायत्री जप कर अभिमाना । हमसम और कोइ नहीं आना ॥
संध्या तर्पण औ षट कर्मा । वेद विचार साध शुचि धर्मा ॥
मुमति विचारकै ज्ञान बखाने । धर्म विधान कथा बहु आने ॥