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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २२८ )

अमरमूल

सोरठा-आप सरीखा जान, ता कई शब्द लखाइयो ।

धर्मदास लेव मान, यही सिखावन पुरुषको ॥

इति श्रीग्रन्थ अमरमूल धर्मराय बाद कालको वर्णन ।

पंचम विश्राम

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास आनंद समाना । विगसेउ कमल उदेजनुभाना॥
बहुत भांतिसों विन्ती कीन्हा । मन वच कर्म चरणचित दीन्हा॥
पदरज लीन्हौ तृषा मिटाई । छूछी सीप स्वाती जिमि पाई॥
रंकहि निधी मिलगई जैसे । अहिमणि मिलै मगन भय ऐसे॥
चरणामृत वह विधिसों लीन्हा । गुरु चरणनको मैं आधीना ॥
अब प्रतीति मोर मन आई । निश्चय वचन मान तुव साँई ॥
अबही जाय लोक मैं देखा । ज्ञान गम्यसों पायउ लेखा ॥
भक्ति मुक्ति दोनों हम जाना । दया तुम्हार परी पहिचाना ॥
जेपर दया तुम्हारी होई । ऐसे पदको पहुँचे सोई ॥
हम जानकै मान उपदेशा । विन सतगुरु नहिं मिटत अँदेशा॥
तुम सतगुरु और सब शिष्या । यही ज्ञान परगट हम देख्या ॥
सतगुरु आप और सब वंशा । सत्य पुरुषको तुम निज अंशा ॥
तुम्हरे बचन लोक पहिचाना । तुम्हरी दया परी अब जाना ॥
यह मन बूझ शब्द है लोका । ज्ञान भयो मिट गये सब शोका॥
लोक अलोक एक कर जाना । तुम्हरे बचन सत्य हम जाना ॥
अब मोरे जिव परचय आई । बिन जाने जाने बूझी दुनियाई॥
नहि बूझौ नाहीं उतराना । यहि पाया हम केवल ज्ञाना ॥
एक बचन मैं बूझा साँई । विन्ती करौं चरण चित लाई ॥