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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1093

बोधसागर

( २२६ )

कबहुँ कहै प्रभुने सब कीन्ह। कबहुँ कहत सब मोर अधीना॥
स्वारथ रूप सदा चित लावै । परमारथ कबहुँ नहि भावै ॥

साखी-कहै कवीर धर्मदास सों, तुम सुनियो चितलाय ।
काल भेद नहि जानहीं, मूरख रहे खुलाय ॥

चौपाई

जो देखा सो काल पसारा । जो बिनसे सो काल अहारा ॥
धर्मदास तुमचित थिर करहू । मनकी डगमग तब परिहरहू ॥
भूत भविष्य वर्तमान जो कहिये । यहि बिधि तीनकाल निर्वहिये ॥
भूत सबै है कालकी काया । भविष्य होय सोइ जीव कहाया ॥
वर्तमान परमात्म जानो । यहि विधितीनकाल पहिचानो ॥
जोई भूत सोई वर्तमाना । सोई भविष्यत भर्मकर जाना ॥
भूत भविष्यत और वर्तमाना । मनथिर भए सबै पहिचाना ॥
शब्द मांहि हंसा निरबहई । मन बिच कर्म नामको गहई ॥
मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥
मन थिर कर परमात्म जाना । यह विधि तत्त्व लेहुपहिचाना ॥
काल जाल तैं तेही लूटै । काल बिचारै ताहि न लूटै ॥
यही भेद धर्मन सुन लीजै । शब्द मांहि बासा तुम कीजै ॥
काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥

साखी-इतना भेद सुन लीजिये, काल को ज्ञान बखान ।
काल पाय कर होत है, हम सों फिर फिर ज्ञान ॥

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास तब पांयन परई । सतगुरु सों बिन्ती अनुसरई ॥
जो तुम कही सोई परवाना । काल पाय कर फिर २ ज्ञाना ॥
तुम प्रसाद मुक्ति फल पावा । यह भवसागर बहुर न आवा ॥
हम सों ज्ञान कहा फिर होही । सोई बात कहो निज मोही ॥