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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1090

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अमरमूल

धन्य भाग्य सतगुरु पगुधारा । अब भयोजीवन सुफल हमारा ॥
एक वचन मोहि कहौ बुझाई । जिह्तिं जीव की संशय जाई ॥
काल कठिन सो काहु न जाना । सो मोसौं कहिये परवाना ॥
जीवत काल चिन्ह जब पावै । तब तुम्हरे सतलोक सिधौवै ॥
जीवत काल चीन्ह नहि जाई । तो कैसे सत लोक सिधाई ॥
तुम तो ज्ञान बहुत उपदेशा । बिन देखे सब लगै अन्देशा ॥
दया करो अपनो जन जानी । काल चिह्न याऊ पहिचानी ॥
बिन चीन्है नहिं होय उबारा । भवसागर बांकी है धारा ॥
काल कठिन है जगकौ फंदा । किहिं विधिजीवहोयनिरद्वन्दा ॥
निरद्वन्दी मोहे करो गुसाई । तौ मैं पंथ चलाऊं जाई ॥

सद्गुरु वचन

साहिब तब कहिबे चितधारा । धर्मदास सुन काल पसारा ॥
काल अमल संशय है भाई । प्रथम काल तुम चीन्हौ आई ॥
जेतक कर्म करै संसारा । सो सब आहि काल व्यौहरा ॥
काल रुयाल जानत नहिं कोई । कर विपरीत सबन कहैं सोई ॥
दस औतार काल ने छलिया । काल अपर्बल सबकहैं दलिया ॥
मीन स्वरूप काल औतारा । कूर्म स्वरूप महा जो धारा ॥
बारह रूप औतार जो कीन्हा । नरसिंह रूप औतारजोलीन्हा ॥
वामन होके बलि कहैं छलऊ । परशुराम होय क्षत्री दलऊ ॥
राम रूप होय रावन मारा । कृष्ण रूप होयकंस पछारा ॥
बौध रूप जगन्नाथ औतारा । लीला बहुत भांति सम्हारा ॥
दस औतार कालके धरिया । म्लेच्छ मारसतयुगसोकरिया ॥
इतनी देह धरी युगमाहीं । काल अमल व्यापै तिनपाहीं ॥
काल मर्म काहू नहिं जाना । सबकहैं पकर कीन्हे पिसवाना ॥
काल पुरुष काहू नहिं चीन्हा । काल पाय सबहिन गहि लीन्हा ॥