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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1078

( २१० )

अमरमूल

जो तुम कही सोई हम जानी । नारी रूप सुर्त पहिचानी ॥
दूसर नारि कहाँ है कीन्हा । यही वचन हम संशय लीन्हा ॥
मैं नररूप आँहु मति हीना । यही भेद सुन भयउ मलीना ॥
तुम तौ दयावर्त गुरु स्वामी । क्षमिय चूक प्रभुअन्तरयामी ॥
नारी नाम मातु जो कहिये । इनहि भेद कैसे निर्वहिये ॥
नारी नाम बहिन जो आही । तासौँ कैसे अंक मिलाही ॥
नारी नाम पुत्री जो होई । तासौँ कैसे अंक सजोई ॥

साखी—यह सब भेद बतावहु, सुनहु हो बंदीछोर ।
यह संशय प्रभु मेटहु, चरण गहों प्रभु तोर ॥

सद्गुरु वचन—चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । यह संशय उपजी तुम पासू ॥
आदि पुरुष तब हते अकेला । शब्द स्वरूपी पंथ दुहेला ॥
तब साहिब ऐसा मत कीन्हा । सकल सृष्टिरचिबेचित दीन्हा ॥
मनसा घटते भिन्न निकारी । उत्पति भई तहाँ इक नारी ॥
सोई नारि सकल जग जाया । भग भोगे तैं पुरुष कहाया ॥
भग द्वारे होय बालक आया । यही भांति सब जग भर्माया ॥
मैं तो एक मतौ रच जबही । पुत्र, बंधु पिता भयो तबही ॥
मैं तो एक नारीकर जबही । पुत्रि, बहिन माता भई तबही ॥
भाई बहिन कीन्हा व्योहारा । धर्मराय को यह संसारा ॥
यह संशय महाँ मार लै जाई । मार जार सब दुनियां खाई ॥
आपहि पिता आपही पूता । आपहि देव आपही भूता ॥
आपहि नारि रूप औतरिया । आपहि सकल सृष्टि विस्तरिया ॥
आपहि कर्म धर्म उपजावन । आपहि रचै आप विनसावन ॥
तातैं भेदे बताऊँ तोही । ज्ञानी होय समझ कर लेही ॥
धर्मदास को संशय छूटा । जन्म जन्मके पातक टूटा ॥