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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1076

( २०८ )

अमरमूल

अब मैं वंशका कहों विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥
आदि नाम आमोदिक शाखा । सोई शब्द वंश कहैं राखा ॥
साठ सभै बारह चौपाई । एही तत्त्व हंस घर जाई ॥
जब माली का भेदहि पावै । सत्य नाम में जाय समावै ॥
ऐसो भेद सुनौ धर्मदासू । जन्म जन्म की भेटत त्रासू ॥
सद्गुरु दया कर्म होय छीना । अमर होय नामहि लौ लीना ॥
संशय का मैं कहों ठिकाना । संशय काल घटमाहि समाना ॥
जबही पुरुष धर्म कहैं कीन्हा । तबही संशय उत्पन लीन्हा ॥
निः अक्षरकी परिचय पावै । संशय मिटे अमर घर जावै ॥
संशय को खंडित है ज्ञाना । ज्ञान हीन संशय लिपटाना ॥
संशय काल सबन कहैं खाई । निःसंशय हो नाम समाई ॥
संशय काल लखै नहि कोई । तातैं गण बिगोय बिगोई ॥
संशय नाम सुनौ धर्मदासू । एक नाम की राखहु आसू ॥
नाम छोड़ अन्तहि चित आनै । संशय तमहि पकर गहि तानै ॥
नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूढे सब हंसा ॥
सारखी-कहैं कबीर धर्मदाससों, संशय को विस्तार ।
एक नाम कहैं जानके, उतरहु भौ जल पार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी संशय उत्पानी । ज्ञान हीन सब जीवहि जानी ॥
विरला हंस होय अंकुरी । सो यह ज्ञान गहै निज मुरी ॥
ज्ञान लखे बिन मुक्ति न होई । तौ यह दुनियां जाय बिगोई ॥
नाम महातम भाख सुनावा । बिना नाम कोई पार न पावा ॥

सद्गुरु वचन

कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । यह निज भेद कहौ तुमपासू ॥
ज्ञान हीन प्रानी जो होई । ताकर भेद कहौ मैं सोई ॥