सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1060, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1060

( १९२ )

अमरमूल

सोरठा-हे प्रभु दीनदयाल, जक्त जीव अति दुखित है ।
हरहु वेग उर साल, करहु कृपा निज दास कहैं ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

धर्मदास तुम मुक्ति अधीना । सो तब कथा सुनहु परवीना ॥
जरा मरन जिवको मिटजाई । पुरुष नाम गहै चितलाई ॥
अम्बर काया तबहीं पावे । अमर शब्द घट मांहि समावे ॥
ताकी महिमा और न जानी । अमर मूलमें कहीं बखानी ॥
अमर मूल है सबते सारा । अमर मूलका कहौं विचारा ॥

साखी-अमर मूल निज ग्रंथ है, कहैं कबीर बिचार ।
अमर मूल जाने बिना, बूड़ा सब संसार ॥

चौपाई

अमर मूल जानौ धर्मदासू । ताकर भेद कहौं परकासू ॥
अमर नाम कबीर कहाई । अक्षर बिन बूड़ी दुनियाई ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास विन्ती अनुसारी । सुनहु गुरु अपराध विसारी ॥
अमर भेद साहिब कह दीजे । तृषा बुझाय अमीरस पीजे ॥
बन्दी छोड़ मुक्तिके दाता । अमर मूल कहिये विरुयाता ॥
संधि भेद कहिये निर्वारी । यहै ग्रंथ है बहुत अपारी ॥
भिन्न भिन्न सब मोहि बताई । जिह्ति मनकी संशय जाई ॥
प्रेम प्रीती तुमही सो लागी । वचन सुधा सुन हो अनुरागी ॥
अमृत नाम कबीर है सारा । पाऊँ ताहि होय निस्तारा ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

तब सतगुरु अस कहै विचारी । तुमसों ज्ञान कहों अति भारी ॥
प्रथमहि सुनो पाकर लेखा । तिहि पीछे नरिअरका लेखा ॥
तव प्रसाद मैं कहों विचारी । इतनी बातमें जीव उबारी ॥