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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1034

( १६६ )

कर्मबोध

कर्म धर्मकी युक्ति बतावे । दान पुण्य बहुविधि अर्थावे ॥
वज्र दान लै जन्म गँवाँवे । होय ऊंट बहु भार लदावे ॥
एक जो करै बरत अवतारा । होई है सूकर श्वान सियारा ॥
सूकर श्वान होकर्मजो भुगता । विन निष्कर्म न होइहे सुकता ॥

सारखी

कबीर-बहु बन्धनसे बाँधिया, एक विचारा जीव ।
जीव बेचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव ॥

रमैनी

शब्द भेद निःशब्द बताओं । करि निःकर्म हंस सुकताओं ॥
निरालम्ब अवलम्ब न जानै । शब्द निरन्तर आप बखानै ॥
पाप पुण्यकी छोड़े आशा । कर्म धर्मते रहे उदासा ॥
रहे उदास नाम लौ लाई । तत्त्व भेद निस्तत्त्व समाई ॥
तीर्थ व्रतके निकट न जाई । भरम भूतको दई बताई ॥
सुखसम्पत्तिनिहिं बिपत्ति विसारे । काम क्रोध तृष्णा परचारे ॥
क्रिया कर्म आचार विचारे । होय निःकर्म कर्म निर बारै ॥
सो ग्रहै जो नियह काया । अभिअन्तरकी मेटे माया ॥
शील स्वभाव शरीर बसावे । अन्तर स्थिर ध्यान लगावे ॥
ब्रह्म अग्नि मनमें परजाले । ताको विष्णु चरण परछाले ॥
गहे तत्त्व निस्तत्त्व बिचारा । काम क्रोधका करे अहारा ॥
सहज योग सो योगी करई । कर्म योग कबहुँ नहिं परई ॥
धन यौवनकी करै न आशा । कामिनि कनकसे रहे उदासा ॥
चहुँ दिशि मंसा पवन ककोले । ज्ञान लहर अभ्यन्तर डोले ॥
उनमुनि रहे भेद नहिं कहई । तत्त्व भेद निस्तत्त्वहिं लहई ॥
ना कोई आय अग्नि होय दहई । आप नीर होय नीचा बहई ॥
मन गयन्द गुरुमतसे मारा । गुरु मन लूटे ज्ञान भँडारा ॥