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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 103

ज्ञानसागर

( १३ )

ऊसर बीज का ऐसा भाऊ । बोवहि बीज अवृथा जाऊ ॥
काचे जीवकहैं सुमिरत देई । परिचय जीव तात गहि लेई ॥
ता कहैं कैसी करहि जमराजा । देह धरै तो गुरु कहैं लाजा ॥
बिना लगन मगन भयो जानी । ऐसो अहे शिष्य सहिदानी ॥
पूरा जब शिष्य जो होई । गुरु देव भेद बतावै सोई ॥
अथवा जो गुरु अन्तर राख्यौ । गुरुमें धोख सन्त में भाखौ ॥
लीक करी औ पंथ बतावै । शोभा अधिक गुरु सो पावै ॥
जस बाना तस होवै करनी । ता गुरु सम औरन बरनी ॥
सदा लीन नाम जो भाखै । पांच आत्मा अनुरुचि राखै ॥
पांचमें करे पच्चीसों नारी । ते बस किये जोग अधिकारी ॥
मरत तजो जस कांचरी सांपा । तातें सब को मेटव दापा ॥
करो शिष्य जो यहि विधिकोई । पुरइन पान रहैं जनु सोई ॥
साखी-जो ऐसी बनि आवै, और बान है सार ॥
तातें ग्रेही थापो, कडिहारी संसार ॥

गुरुवाके लक्षण चौपाई

आप स्वारथी भेष बनावै । मन की दशा ताहि चित लावै ॥
तृष्णा जुक्त करे गुरुवाई । जम सो बाचै कौन उपाई ॥
निश्चय मानो शब्द हमारा । पर द्रोही कैसा कडिहारा ॥
आप अबूझ औरन समझावै । साखी रमैनी झगरो लावै ॥
जातें साधु सेवा नहिं आवै । तृष्णा कारण भेष बनावै ॥
सिंह न चाहै स्वान सियारा । पैरच बिना कैसे कडिहारा ॥
पर नारी औ मन्मथ कर्मा । यह तो भेद काल को मर्मा ॥
मारहि मनसा होइ सो होई । नातर नारि करे पुनि लोई ॥
ग्रेही माहि भक्ति को भेवा । नाम जपै औ साधू सेवा ॥
जोपै सहज भाव कडिहारा । शिष्य कियेका क्या अधिकारा ॥