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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1009

बोधसागर

( १४१ )

साखी-व्यालिसके निकासी-धर्मदास उवाच
धर्मदाम जब विनती लाई । हमसों पन्थ ना चले गोसाईं ॥
नरदेहीसों पन्थ चले ना भाई । जाते अपना अंश पठाई ॥
अंश बयालिस देहु पठाई । ते जग हंस लेहि सुकताई ॥
तुम्हें सिखावन हमसों लीना । तुम्ह लै धर्मदासको दीन्हा ॥
बचन वंश एक है भाई । नाम वंश जग मैं बताई ॥
बचन वंश है आदि निशानी । तिन्हकी पावै जग सहेदानी ॥
नाम नरायण हैं अभिमानी । तुम संसार फिर जावो अब ज्ञानी ॥

कबीर उवाच

तब समर्थ मोसे अस कही । बंशहि अस चुरामणि सही ॥
तुम्ह जो सिखावन हमसों लीन्हा । ऐसा जग चुरामणि कीन्हा ॥
संधिक नाम है उन्हकी देही । पावै हंसा जो हमरे सनेही ॥

साखी-यह निज बचन समर्थके, हमसो मेटि न जाय ।
अमीनिको मैं सोंपो है, तुमको सोंपि न जाय ॥

साखी-धर्मदास उवाच

धर्मदास तब भए मलीना । उठि सद्गुरुसों विनती कीन्हा ॥
हो साहेब मैं तुम बलहारी । बंसनारायन शरण तुम्हारी ॥
नाम प्रतीत तुम करो संभारी । नामनरायन तुम बोल विचारी ॥
अपनी बोध राखौ संसारा । विन्द बंस प्रण आए हमारा ॥

साखी-इतनी विनती मैं कहूं, तुम दाता गुरु मोर ।

संशय मेटो जीवको, लेहो फँदको छोर ॥

साखी-वंश विषेदकी-सतगुरु उवाच

धर्मदास तुम बड़े विवेकी । तुम्हरे घटमें बुद्धि बढ़ देखी ॥
घर घर गुरु जगतमें होई । हमरे गुरु बचन बंस है सोई ॥
वह सब करै सुख चतुराई । ताते जीव राखे भरमाई ॥