कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १३९ )
अच्छर अच्छर अतीतकी बानी । निःअच्छर कोई बिरले जानी ॥
निःअक्षर की अक्षर श्वासा । नहीं धरनी नहीं गगन प्रकासा ॥
अक्षर तीनि लोक बिस्तारा । तामें अरुझो सब संसारा ॥
तीन सुत तेज अंडमों आई । आप आप इन्हें आप हटाई ॥
चार वेद कहै तिनकी साखी । अक्षर अतीत थापि उन्ह राखी ॥
अब भिन्न भिन्न कहूं अर्थीई । सात सुरतिके स्थान बताई ॥
अक्षर अतीत माया सो कहिये । सोई सुरति निरंजन लहिये ॥
अक्षर सुरति दुतिय है स्थाना । जिनके चार वेद परवाना ॥
शब्दातीत अनहद रहता । प्रेम धाम अक्षरकी चहता ॥
चार सुरतिका भेद नियारा । तीनि सुरतिका देउ विचारा ॥
पांचे सुरति अंकुरकी बानी । पांचे स्थान तेहि ठहरानी ॥
छटे स्थाना अंकुरकी है आपा । जेहिते सात करी उततापा ॥
सातवी सुरति सहजकी रही । उहि समरथको देखा सही ॥
सात सुरति सात है स्थाना । मूल सुरति है समर्थ प्रमाना ॥
सहज सुरति सब सुतं उपजाई । मूल सुरति लै हंस समाई ॥
मूल सुरति है सबको मूला । सात सुरतिको एक स्थूला ॥
सात सुरति मूल सिध सब माहीं । धर्मदास लखि राखौ ताहीं ॥
शब्द पांजी इतना परमाना । अब कहूं कायाकी बन्धाना ॥
सातों सुरति कायामें रहै । औ काया धरि बातें कहै ॥
सुरति स्थान
प्रथमहि दीप अमर मनियारा । तहैं वा मूल सुरति बैठारा ॥
दुसरा अजर दीप तहाँ कीन्हा । सहज सुरतिको बैठक दीन्हा ॥
चौपाई
तीसर दीप हिरण्मय सोई । सुरति अंकुरकी बैठक होई ॥
चौथे दीप सुरंग निर्मावा । ओहं सोहं तहाँ बैठवा ॥