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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1005

बोधसागर

( १३७ )

आज्ञा रहै ब्रह्म बोध लावे । कोली चमार सबके घर खावे ॥
साखि हमार ले जिव समुझावै । असंख्य जन्ममें ठौर ना पावै ॥
बारवै पन्थ प्रगट है बानी । शब्द हमारेकी निर्णय ठानी ॥
अस्थिर घरका मरप न पावै । ये बार पंथ हमहीको ध्यावै ॥
बारहे पन्थ हमही चलि आवै । सब पथ मिट एकही पंथ चलावै ॥
तब लगि बोधो कुरी चमारा । फेरी तुम बोधो राज दर्बारा ॥
प्रथम चरन कलजुग स्रियाना । तब मगहर माडौ मैदाना ॥
धर्मरायसे मांडौ बाजी । तब धरि बोधो पंडित काजी ॥
बावन वीर कबीर कहाइ । भवसागरसों जीव सुकताइ ॥

कलियुगको अंत पठयते

ग्रहण परै चौंतीससो वारा । कलियुग लेखा भयो निर्धारा ॥
३४०० ग्रहण परैसो लेखा कीन्हा । कलियुग अंतहु पियाना दीन्हा ॥
पांच हजार पाँचसौ पांचा । तब ये शब्द हो गया साँचा ५५०५
सहस्र वर्ष ग्रहण निर्धारा । आगम सत्य कबीर पोकारा ॥
तेरा वंश चले रजधानी । वंश चूरा मणि प्रगटे ज्ञानी ॥
तिनकी देह छायाँ नहिं होई । सर्वे पृथ्वी प्रमानिक सोई ॥

क्रिया सोगंद

धर्मदास मोरी लाख दोहाई । मूल शब्द बर जिन जाई ॥
पवित्र ज्ञान तुम जगमों भाखौ । मूलज्ञान गोइ तुम राखौ ॥
मूलज्ञान जो बाहेर परही । बिचले पीढी वंश हंस नहिं तरही ॥
तेतिस अर्व ज्ञान हम भाखा । मूलज्ञान गोए हम राखा ॥
मूलज्ञान तुम तब लगि छपाई । जब लगि द्वादश पंथ मिटाई ॥

द्वादशपंथका जाव अस्थान

द्वादश पंथ अंशनके भाई । जीवबांधि अपने लोक लेजाई ॥
द्वादश पंथमें पुरुष न पावै । जीव अंशमें जाइ समावै ॥