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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १३२ )

कबीरबानी

नारियर मोरिके मालुम कीन्हा । समरथ भोग सुर्तसों लीन्हा ॥
लिखनी पान हाथके लेउ । सत्यके अंक पानपर देऊ ॥
तब यमपुरमें परचो खँबारा । सुत्तिके पंथ चल्यो संसारा ॥
अजरपान धर्मदासको दीन्हा । हंसरूप करि अपना लीन्हा ॥
अब तुम हमको चिन्हों भाई । गईतिमिर पिछली सुधि आई॥
पान प्रसाद सिखावन पावा । शीश उतारि ले चरण छुवावा ॥
धर्मदास तुम्हें सब विधि कीन्हा । माँगों वचन मैं सर्वस दीन्हा ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनती अनुसारी । पायो बोल वचन मैं हारी ॥
मैं तरों और हमारी शाखा । और पीछले सबही पुरखा ॥

सद्गुरु उवाच

तब सतगुरु मनमें विहसाने । ते कहा माँग्योकछु माँगेनजाने ॥
सर्व सृष्टिको तारो भाई । तुम तो आपन वंश ठहराई ॥
एहि प्रपंच काल सब कीन्हा । मतिबुधि खैंचितुम्हारी लीन्हा ॥
तब धर्मदास जो भये मलीना । जैसे कँवलको संपुट दीन्हा ॥
तब सतगुरु फिर बोध विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥
एक वस्तु गोय हम राखी । सो निर्णय नहीं तुमसों भाखी ॥
नौतन सुरति हमारी शाखा । सातसुरति जो उत्पति भाखा ॥
आठवीं सुरत तुमहि चलि आए । नौतम सुरति हम गुप्त छिपाए ॥
नौतम सुरति वचन निज मोरा । जेहिते पला न पकरै चोरा ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास दोनों कर जोरा । कहो वचन सोई सद्गुरु मोरा ॥
सोई वचन कहौ समुझाई । जेहिते जीवन सृष्टि नहीं आई ॥

सद्गुरु उवाच

आठ बुन्दकी जुगति बनाई । नौतमते आठों बुन्द मुक्ताई ॥
बिना गुरु कोऊ भेद नहीं पावे । युग बँधे सो हंस कहावे ॥