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सर्वकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 657, कुल 1367 में से

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पृष्ठ 657

कूड़ा राक्षसने मरदानेको बाँधकर गरम तेलमें डाल दिया । वह तेलका कड़ाह साहबकी दयासे ठण्ढा हो गया, कूड़े को बड़ा आश्चर्य हुआ कि, यह कौन पुरुष है । जिसके कारण मेरी उत्तम कड़ाही एकदम पानीके समान ठण्ढी हो गई ।

यह कूड़ा राक्षस पहले ब्राह्मण और बड़ा पण्डित था । एक दिवस वह बैठता था कि, उसके गुरु आये । उनको देखकर वह अपनी विद्याके घमण्डसे नहीं उठा, न गुरुको प्रणामही किया । गुरुने कहा कि, हे पापी ! तूने अपनी विद्याके घमण्डसे प्रणाम नहीं किया है इस कारण राक्षस हो जा ; कूड़ाने अपने गुरुके चरणोंपर गिरकर कहा कि, अब मेरे अपराधोंको क्षमा करो । गुरुने उसको एक दर्पण देकर कहा कि, तू अवश्यही राक्षस होगा पर जिसको खानेको पकड़े उसे इस दर्पणमें देख लेना । जो कोई मनुष्य दिख ई दे उसको मत खाना जो पशु दिखाई दे उसको खा जाना । जब तुमको कोई मनुष्य दिखाई देगा उसके द्वारा तेरी इस योनिसे मुक्ति हो जायगी ।

कूड़ेने मरदानेको कड़ाहीमें डाला, कड़ाही ठण्ढी हो गई, नानक साहबने कूड़ेसे कहा कि, तू इसको भूनकर क्यों नहीं खाता क्या विलम्ब है ? कूड़ेने उस दर्पण द्वारा नानक साहबको देखा तो स्पष्ट रूपसे मनुष्यकी भव्य मूर्ति दिखाई दी ।

तब वह कूड़ा राक्षस नानक साहबके चरणोंपर गिरा, विनय करने लगा कि, महाराज ! आज मेरे गुरुका वचन पूरा हुआ । आजदिनतक जो मैं मनुष्योंको मारकर खाता था, प्रत्यक्षमें तो वे सब मनुष्यरूपमें दिखाई देते थे । परन्तु यथार्थमें वे सब पशुही थे । आजके दिवस केवल आप एक मनुष्य मिले हो दूसरा मनुष्य कभी कोई नहीं मिला, जितने मिले सब पशुही मिले । उन्हींको मैं खाया करता था । आप मनुष्य मिले हो, मेरा छुटकारा कीजिये । कूड़े राक्षस पर नानक साहबकी दया हुई वह सुखी हो गया । यह उदाहरण मैंने इस कारण लिखा है, कि, केवल हंस कबीरही को मनुष्यत्वका पद प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं होता क्योंकि, जैसे मैंने पहले सुपच सुदर्शनका वृत्तान्त लिखा कि, पुष्करजीमें सवा लाख प्रदीप जलवाकर जब देखा तो केवल सुपच सुदर्शनजी मनुष्य दिखाई दिये । शेष सभी डङ्गर, ढोर, कीड़े, मकोड़े, पशु, पक्षी इत्यादि थे । तब श्रीकृष्णचन्द्रने पाण्डवोंसे कहा कि, हे राजा युधिष्ठिर ? यमने सुपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता देखी कि, नहीं ! वही बात तथा गुण नानक साहब तथा दूसरे हंस कबीरोंमें देखलो । कुछ भी विभिन्नता नहीं जिनको हंस पद प्राप्त नहीं हुआ सो सब बकुले हैं केवल हंस कबीर ही मनुष्य हैं ।

साखी - काहे हिरनी दूबरी, यही हरियरे ताल ।

लक्ष शिकारी एक मृग, कैंतिक टारे भाल ॥

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