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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 332 में से

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पृष्ठ 200

१९६ ज्ञानयोग

देखा है। लोग कहते हैं कि वह "स्वाभाविक ज्ञान" है। "स्वाभा-
विक ज्ञान" कहने से हमने एक लम्बे चौड़े शब्द का प्रयोग किया
है इतना ही, किन्तु उसने हमें नयी कोई वस्तु नहीं सिखाई। अब
आलोचना की जाय कि यह स्वाभाविक ज्ञान है क्या। हमारे
भीतर ही अनेक प्रकार के स्वाभाविक ज्ञान वर्तमान हैं। मानो
एक व्यक्ति ने पियानो पर गाना बजाना सीखना शुरू किया। पहले
'सरगम' की ओर गहरा ध्यान देकर उंगलियों को चलाना पड़ता है,
किन्तु कई महीनो तथा सालो अभ्यास हो जाने पर उंगलियाँ आप ही
आप ठीक ठीक स्थानो पर चलती फिरती है और वह स्वाभाविक हो
जाता है। किसी समय जिसमे ज्ञानपूर्वक इच्छा का प्रयोजन होता था,
उसमे और उसकी कोई ज़रूरत न रह गई, एवं ज्ञानपूर्वक इच्छा के
बिना ही वह अब सम्पन्न हो सकता है और उसी को स्वाभाविक ज्ञान
कहते है। पहले यह इच्छा के साथ था, अन्त मे उसमे इच्छा का कोई
प्रयोजन न रहा। किन्तु स्वाभाविक ज्ञान का तत्व अभी पूरा नहीं
कहा गया है, अब भी आधा रह गया है। वह यह है कि जो सब
कार्य अब हमारे लिये स्वाभाविक हैं, प्रायः उन सभी को हम अपनी
इच्छा के वश मे ला सकते है। शरीर की प्रति पेशी को ही हम
अपने वश मे ला सकते है। आजकल यह विषय हम सभो को अच्छी
तरह से ज्ञात है। अतएव अन्वयी व व्यतिरेकी इन दोनो उपायो से
ही प्रमाणित किया गया है कि जिसे हम स्वाभाविक ज्ञान कहते हैं
वह इच्छाकृत कार्य के अवनत भाव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
अतएव जब सारी प्रकृति मे एक ही नियम का राज्य है तो समग्र
सृष्टि मे 'उपमान-प्रमाण' का प्रयोग करके इस सिद्धान्त पर हम पहुंच