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जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

ज्योतिष-ग्रन्थाः
जन्मपत्रदीपकः । पं० विन्ध्येश्वरी प्रसाद
द्विवेदी कृत हिन्दी टीका नोट्स युक्त ५-००
सूर्यसिद्धान्तः । (भारतीय खगोलविद्या
का ग्रंथ) पं० श्री कपिलेश्वर चौधरी
कृत 'तत्त्वामृत' संस्कृत टीका, नोट्स
आदि सहित ४५-००
मुहूर्तमार्तण्डः । नारायण दैवज्ञ कृत । पं०
कपिलेश्वरशास्त्री कृत 'मार्तण्डप्रका-
शिका' संस्कृत-हिन्दी टीका सहित १५-००
चापीयत्रिकोणगणितम् । श्री नीलाम्बर
झा कृत । पं० श्री अच्युतानन्द झा कृत
'विविध वासना' विशद टीका युक्त ४-००
सिद्धान्तशिरोमणिः । भास्कराचार्य
कृत । स्वकृत 'वासना भाष्य'सहित ।
पं० मुरलीधर ठाकुर कृत 'प्रभा-
वासना' टीका, नोट्स, प्रमाण आदि
युक्त । प्रथम भाग १०-००
नरपतिजयचर्यास्वरोदयः । श्री नरपति
कविकृत । पं० गणेशदत्त पाठक कृत
'सुबोधिनी' सं० हिन्दी टीका सहित ४५-००
गणितकौमुदी । पं० गणपति देव शास्त्री
कृत । १-२ भाग । द्वितीय भाग २-५०
जातकालंकारः । श्री गणेश दैवज्ञ कृत ।
श्री हरभानु शुक्ल कृत संस्कृत टीका
सहित । श्री दीनानाथ झा कृत
'भावबोधिनी' हिन्दी टीका सहित ४-००
आचार्य भास्कर (भास्कराचार्य-एक
अध्ययन) लेखक-पं० रामजन्म मिश्र ५-००
प्रश्नचण्डेश्वरः । दैवज्ञरामकृष्णविर-
चितः । सान्वय, हिन्दी भाषा टीका
एवं टिप्पणियों से शोभित, व्याख्या-
पं० रामजन्म मिश्र ७-५०
जातकपारिजातः । श्री वैद्यनाथ कृत ।
पं० कपिलेश्वर चौधरी कृत 'सुधा
शालिनी' संस्कृत टीका तथा पं०
मातृप्रसाद पाण्डेय कृत 'विमला'
हिन्दी टीका सहित ७५-००
प्राप्तिस्थान :-
चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी

( काशी संस्कृत ग्रन्थमाला ४६ )
श्रीमच्छतानन्द विरचिता
भास्वती
श्रीमातृप्रसाद ( दैवज्ञभूषण ) पाण्डेयेनकृता
‘छात्रबोधिनी' संस्कृतभाषाटीकासहिता
आचार्यरामजन्ममिश्रेण संशोध्य टिप्पण्यादिभिरलंकृता
श्रीमान् आचार्य शतानन्द द्वारा विरचित भास्वती करण ग्रन्थ है। इसका
निर्माण ई० सन् १०९९ में हुआ था। आचार्य वाराह मिहिर के सूर्य-सिद्धान्त के
आधार पर जो सम्प्रति पञ्चसिद्धान्तिका में उपलब्ध है, बनी है। पहले इस ग्रन्थ
का बहुत अधिक प्रयोग था। उस समय इसकी अनेक संस्कृत टीकायें मिलती थीं
किन्तु समय ने विशिष्ट गुणयुक्त अत्युपयोगी इस ग्रन्थ को भी लुप्तप्रायः कर
दिया। इसमें ग्रहों का क्षेपक शक १०२१ की स्पष्ट मेष-संक्रान्ति काल (गुरुवार)
का है। इसमें अहर्गण के आधारपर ग्रहों को स्पष्ट करने की विधि नहीं है
वरन् ग्रहों की वार्षिक गति के अनुसार है जिससे गणना करने में बड़ी सुविधा
है। आचार्य ने शतांश प्रणाली से गणित का काम किया है अर्थात् राशि अंश
कला विकला लिखने के स्थान पर राशि के सौवें भाग में या नक्षत्र के सौवें भाग
में ग्रहस्थिति बतायी है। जैसे चन्द्रमा की एक वर्ष की गति ९७० ५/६ नक्षत्र शतांशों
में बतायी गई है जिसका अर्थ है—
९७० ५/६ / १०० नक्षत्र = (९७० ५/६ / १००) x ८०० कला
= ७७६६ २/३ कला = ४ राशि १२ अंश ४६ कला ४० विकला
इसी प्रकार शनि का क्षेपक ५१४ शतांश राशि है जिसका अर्थ दशमलव
भिन्न में ५.१४ राशि हुआ। इस प्रकार आधुनिकतम गणितोपयुक्त यह ग्रन्थ
शीघ्र प्रकाश में आ रहा है। ( १९८४ ) ४०-००
प्राप्तिस्थान—चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी-२२१००१