जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० सटीकजातकपारिजाते-
मङ्गल दशम स्थानमें हो तो प्रबल-प्रताप-धनसे प्रसिद्ध हो । बुध दशम स्थानमें हो
तो समस्त विद्याका ज्ञाता, यशस्वी, धनी विनोदी हो ॥ ९० ॥
बृहस्पति दशम स्थानमें हो तो सिद्ध, साधुचरित, स्वधर्मी, विद्वान और धनी होवे।
शुक्र दशम स्थानमें हो तो खेती आदि कार्यसे, स्त्रीसे धन प्राप्त हो, विभु हो ॥ ९१ ॥
यदि शनि दशम स्थानमें हो तो दण्डकर्ता, मानी, धनी, निजकुलमें वीर हो । राहु
दशम स्थानमें हो तो चोरोंमें निपुण, बुद्धिमान और उद्धत हो ॥ ९२ ॥
केतु दशम स्थानमें हो तो विद्वान्, बली, शिल्पविद्, आत्मज्ञानी, जनानुरागी,
विरोधवृत्ति, कफात्मक, वीरोंमें श्रेष्ठ और सदा घूमनेवाला होता है ॥ ९३ ॥
अथ लाभस्थग्रहफलम् ।
भानौ लाभैगते तु वित्तविपुलस्त्रीपुत्रदासान्वितः
सन्तुष्टश्च विषादशीलधनिको लाभस्थिते शीतगौ ।
आयँस्थे धरणीसुते चतुरवाक्कामी धनी शौर्यवान्
सौम्ये लाभगृहं गते निपुणधीर्विद्यायशस्वी धनी ॥ ९४ ॥
आयस्थेऽमरमन्त्रिणि प्रबलधीर्विख्यातनामा धनी
लाभस्थे भृगुजे सुखी परवधूलोलाटनो वित्तवान् ।
भोगी भूपतिलब्धवित्तविपुलः प्राप्तिं गते भानुजे
राहौ श्रोत्रविनाशको रणतलश्लाघी धनी पण्डितः ॥ ९५ ॥
उपान्त्यायाते शिखिनि प्रतापी परप्रियश्चान्यजनाभिवन्द्यः ।
सन्तुष्टचित्तः प्रभुरल्पभोगी शुभक्रियाचाररतः प्रजातः ॥ ९६ ॥
अत्र त्रिभिः श्लोकैर्लाभ-(११) भवने ग्रहाणां फलान्युक्तानि । तेषु—परवधूलोला-
टनः = परेषामन्येषां वधूषु स्त्रीषु लोलश्चञ्चलचित्तः ( परस्त्रीकामुक इति ) अटनो भ्रमण-
शीलश्चेति । श्रोत्रविनाशकः = कर्णविहीनो बधिर इति । रणतलश्लाघी = सङ्ग्रामप्रियः ।
अन्यत्सकलं स्पष्टमेवेति ॥ ९४-९६ ॥
सूर्य लाभ ( एकादश ) स्थानमें हो तो विपुल धन, स्त्री, पुत्र और दाससे युक्त हो ।
चन्द्रमा लाभमें हों तो सन्तुष्ट, विषादी और धनी हो । मङ्गल लाभमें हो तो चतुर-
वचन बोलनेवाला, कामी, धनी और पराक्रमी हो । बुध लाभमें हो तो निपुणबुद्धि,
विद्या-यशवाला, और धनी हो ॥ ९४ ॥
गुरु लाभमें हो तो प्रबल बुद्धि, विख्यातनाम और धनी हो । शुक्र लाभमें हो तो सुखी,
परस्त्रीमें रत, घूमनेवाला और धनी हो । शनि लाभमें हो तो भोगी और राजासे प्राप्त विपुल
धनवान् हो । राहु लाभमें हो तो कर्णरहित, रणोत्सुक, धनी और पण्डित हो ॥ ९५ ॥
केतु लाभमें हो तो प्रतापी, परप्रिय, अन्यजनसे वन्दनीय, सन्तुष्टचित्त, समर्थ, अल्प
भोगी, शुभ क्रिया तथा आचारवान् हो ॥ ९६ ॥
अथ व्ययस्थग्रहफलम् ।
व्यैयस्थिते पूषणि पुत्रशाली व्यङ्गः सुधीरः पतितोऽटनः स्यात् ।
चन्द्रेऽन्त्ययाते तु विदेशवासी भौमे विरोधी धनदारहीनः ॥ ९७ ॥
बन्धुद्वेषकरो धनी विगतधीस्तारासुते रिष्फँगे
चार्वाकी चपलोऽटनः खलमत्तिर्जीवे यदाऽन्त्यं गते ।
शुक्रे बन्धुविनाशकोऽन्यगृहगे जारोपचारोऽधनी
मन्दे रिष्फगृहं गते विकलधीर्मूर्खो धनी वञ्चकः ॥ ९८ ॥