जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 302, कुल 588 में से
संदर्भ में पढ़ें२७६ सटीकजातकपारिजाते-
सोदरारातिगः शुक्रः शोकरोगभयप्रदः ।
तत्रैव शुभकारी स्यात् पुरतो यदि भास्करात् ॥ ६७ ॥
श्लोकत्रयेण तृतीयभावस्थग्रहाणां फलान्युक्तानि । सरलार्थाः श्लोकाः ॥ ६५-६७ ॥
सूर्य तीसरे भावमें हो तो पराक्रमी, दुर्जन सेवित, विशेष धनी, और दानी हो ।
चन्द्रमा तृतीय भावमें हो तो अल्प धनी, बन्धुप्रिय, और सात्विक हो । मंगल तीसरे
भावमें हो तो अपार पराक्रमी, और शठ-बुद्धि हो । बुध तृतीय स्थानमें हो तो मायावी,
घूमनेवाला, अत्यन्त चञ्चल और दीन हो ॥ ६५ ॥
गुरु भ्रातृ स्थानमें हो तो धन रहित, स्त्रीसे पराजित, पाप करनेवाला हो । शुक्र तृतीय
भवनमें हो तो रोष युक्त वचन बोले, और पापी हो, तथा स्त्रीसे पराजित हो । शनि तृतीय
स्थानमें हो तो अल्प भोजी, धन-शील-वंशसे युक्त और गुणवान् हो । राहु तीसरे भावमें
हो तो अत्यन्त बली और धनी हो । केतु हो तो गुणी और धनी हो ॥ ६६ ॥
शुक्र तृतीय और षष्ठभावमें हो तो शोक-रोग-भय देता है, और उन्हीं स्थानों में शुक्र
यदि सूर्यके आगे हो तो शुभ फल देता है ॥ ६७ ॥
अथ चतुर्थस्थग्रहफलम् ।
हृद्रोगी धनधान्यबुद्धिरहितः क्रूरः सुखस्थे रवौ
विद्याशीलसुखान्वितः परवधूलोलश्चतुर्थे विधौ ।
भौमे बन्धुगते तु बन्धुरहितः स्त्रीनिर्जितः शौर्यवान्
बन्धुस्थे शशिजे विबन्धुरमलज्ञानी धनी पण्डितः ॥ ६८ ॥
वाग्मी धनी सुखयशोबलरूपशाली जातः शठप्रकृतिरिन्द्रगुरौ सुखस्थे ।
स्त्रीनिर्जितः सुखयशोधनबुद्धिविद्यावाचालको भृगुसुते यदि बन्धुयाते ॥ ६६ ॥
आचारहीनः कपटी च मातृक्लेशान्वितो भानुसुते सुखस्थे ।
राहौ कलत्रादिजनावरोधी केतौ सुखस्थे च परापवादी ॥ ७० ॥
त्रिभिः श्लोकैश्चतुर्थभावगतानां ग्रहाणां फलान्युक्तानि । स्पष्टार्थाः श्लोकाः॥६८-७०॥
सूर्य चतुर्थ स्थानमें हो तो हृदय रोगवाला, धन-धान्य-बुद्धिरहित और क्रूर होवे ।
चन्द्रमा चतुर्थ स्थानमें हो तो विद्या-शील-सुखसे युक्त और परस्त्रीगामी हो । मंगल चतुर्थ
स्थानमें हो तो परिवारसे हीन, स्त्रीसे निर्जित और पराक्रमी हो । बुध चतुर्थ स्थानमें हो तो
परिवार रहित, श्रेष्ठ ज्ञानी, धनी, और पंडित हो ॥ ६८ ॥
बृहस्पति सुख स्थानमें हो तो वाचाल, धनी, सुख-यश-रूप-बलवाला, शठ-स्वभाव
होता है । यदि शुक्र चतुर्थ स्थानमें हो तो स्त्रीसे पराजित, सुख-यश-धन-विद्या युक्त हो
और वाचाल हो ॥ ६९ ॥
शनि सुख भवन में हो तो आचार हीन, कपटी, मातृ-क्लेश युक्त हो । राहु चतुर्थमें
हो तो स्त्री आदि जनोंका अवरोध करनेवाला हो । केतु सुखमें हो तो दूसरों को दोष
लगानेवाला हो ॥ ७० ॥
अथ पञ्चमस्थग्रहफलम् ।
राजप्रियश्चञ्चलबुद्धियुक्तः प्रवासशीलः सुतगे दिनेशे ।
मन्त्रक्रियासक्तमना दयालुर्घनी मनस्वी तनये सतीन्दौ ॥ ७१ ॥
क्रूरोऽटनश्चपलसाहसिको विधर्मा भोगी धनी च यदि पञ्चमगे धराजे ।
मन्त्राभिचारकुशलः सुतदारवित्तविद्यायशोबलयुतः सुतगे सति ज्ञे ॥ ७२ ॥
मन्त्री गुणी विभव(सार समन्वितः स्यादल्पात्मजः सुरगुरौ सुतराशियाते ।
सत्पुत्रमित्रधनवानतिरूपशाली सेनानुरङ्गपतिरात्मजगे च शुक्रे ॥ ७३ ॥