जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजातकमङ्गाध्यायः ॥ ६ ॥ - १६५
चन्द्रमा जलचर राशिमें हो, उस स्थानका स्वामी षष्ठ स्थानमें हो उसे जलचरराशि-
गत ग्रह देखते हों तो मूत्रकृच्छ्र (सूजाक) रोग होवे । चन्द्रमा अष्टमभाव या शत्रुभावमें
हो उसे मंगल देखता हो और लग्नमें शनि हो तो रक्तरोग होवे ॥ ८८ ॥
इदानीं गुल्मरोगं दाहरोगञ्चाह-
क्षीणे मन्दगृहोदये हिमकरे पापग्रहैरन्विते
रन्ध्रारातिगतेऽथवा पवनकृद् गुल्मादिरोगं वदेत् ।
चन्द्रे पापवियच्चरान्तरगते मन्दे मदस्थानगे
जातो विद्रधिजन्मशोषजनितैः सन्तप्तदेहो भवेत् ॥ ८९ ॥
क्षीणे इति । क्षीणे = क्षयिष्णौ हिमकरे=चन्द्रे पापग्रहैरन्विते=सहिते मन्दगृहोदये=
मकरोदये वा कुम्भोदयेऽथवा रन्ध्रारातिगतेऽष्टमे षष्ठे वा भावे गतवति पवनकृत्=वायुजनितं
गुल्मादिरोगं वदेत् । चन्द्र इति । चन्द्रे पापवियच्चरयोरन्तरे = मध्ये गते (चन्द्रादेको
द्वितीयेऽपरो द्वादशे पापो भवेत् ) मन्दे=शनौ मदस्थानगे=सप्तमभावमुपगते जातो नरो
विद्रधिजन्मशोषजनितैः=विद्रधिरुदरव्याधिभेदः 'व्याधिभेदाः विद्रधिः स्त्री' इत्यमरः । जन्म-
शोषो व्याधिभेदस्तैर्जनितैरामयैः जातः सन्तप्तदेहो भवेदिति ॥ ८९ ॥
शनिके गृहमें क्षीण चन्द्रमा पापग्रहोंसे युक्त हो, वा अष्टम या षष्ठ स्थानमें हो तो
वायुकुपित गुल्मरोग कहे । चन्द्रमा पापग्रहके मध्यमें हो, शनि सप्तम हो तो जातक जन्मसे
ही सूखा रोगसे सन्तप्त देह हो ॥ ८९ ॥
श्लोकेनानेनोदररोगभेदा उच्यन्ते-
अजीर्णगुल्मामयशूलमेति कुजे विलग्ने विबलेऽरिनाथे ।
लग्ने सपापे फणिनायके वा मन्देऽष्टमे कुक्षिरुगर्दितः स्यात् ॥ ९० ॥
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| \ २ / \ / \ १२ बु. / |
| \ / \ १ मं./ \ / |
| ३ \ / \ / \ / ११ |
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| ४ | कुक्षिरोगः | १० |
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| ५ / \ / \ / \ ९ |
| / \ / ७ \ / \ |
| / ६ \ / \ / ८ श. \ |
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अजीर्णति । सरलार्थः ॥ ९० ॥
मंगल लग्नमें हो और षष्ठेश निर्बल हो तो
अजीर्ण और गुल्म रोगसे पीड़ा होती है ।
लग्न पापग्रहसे युक्त हो, वा राहुसे युक्त हो,
शनि अष्टममें हो तो कुक्षि (पेटके) रोगसे
पीड़ित हो ॥ ९० ॥
इदानीं हृदयशूलरोगयोगं शूलयोगञ्चाह-
हृच्छूलरोगमुपयाति सुखे फणीशे पापेक्षिते गतबले यदि लग्ननाथे ।
शूलामयं तनुपतौ रिपुनीचराशौ भौमे सुखे रविसुते यदि पापदृष्टे ॥६१॥
हृदिति । सरलार्थः ॥ ९१ ॥
यदि राहु सुख ( ४) में हो और लग्ननाथ पापदृष्ट और बलहीन हो तो हृदय-शूल
रोग होता है। लग्नेश शत्रुगृहमें, वा नीच राशिमें हो और मंगल चौथे हो, शनि यदि
पापग्रहसे देखा जाता हो तो शूलरोग होता है ॥ ९१ ॥