जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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विषय पृष्ठ
१४२. सिगाल जातक .. .. .. .. १०८
[ गीदड़ों को मारने की इच्छा से एक धूर्त आदमी ने
मुर्दे का स्वांग किया । ]
१४३. विरोचन जातक .. .. .. .. ११०
[ गीदड़ ने शेर की नकल करके पराक्रम दिखाना चाहा ।
हाथी ने उसे पाँव से रौंद दिया, उस पर लीद कर दी । ]
१४४. नङ्गुट्ठ जातक .. .. .. .. ११४
[ ब्राह्मण अग्नि-भगवान को गो-मांस चढ़ाना चाहता
था । चोर ही उस बैल को मार कर खा गए । ब्राह्मण
बोला—हे अग्नि भगवान् ! आप अपने बैल की रक्षा भी
नही कर सके । अब यह पूँछ ही ग्रहण करे । ]
१४५. राध जातक .. .. .. .. .. ११६
[ पोट्ठपाद और राध नाम के दो तोते ब्राह्मणी का
अनाचार प्रकट करने के बाद उस घर में नही रहे । ]
१४६. काक जातक .. .. .. .. .. ११८
[ कौवी को समुद्र बहा ले गया । कौवों ने क्रोधित हो
उलीच-उलीच कर समुद्र खाली करना चाहा । ]
१४७. पुप्फरत्त जातक .. .. .. .. १२१
[ स्त्री ने केसर के रंग का वस्त्र पहन उत्सव मनाने की
जिद की । स्वामी को चोरी करनी पड़ी । राजाज्ञा से
उसका वध हुआ । ]
१४८. सिगाल जातक .. .. .. .. १२४
[ मास-लोभी सियार हाथी के गुदा मार्ग से उसके पेट
में प्रविष्ट हो वहां कैद हो गया । ]
१४९. एकपण्ण जातक .. .. .. .. १२८
[ बोधिसत्त्व ने नीम के पौधे के दो पत्तों की कड़वाहट
चखा कर राजकुमार का दुष्ट स्वभाव दूर किया । ]