जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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कर सोचा—खाली हाथ जाने से मुझे क्या लाभ ? इस बन्दरी को मार कर
जाऊँगा।
उसने उसे मारने के लिए धनुष हाथ में लिया। बोधिसत्व ने यह देख
चुल्लनन्दिय को कहा—तात ! यह आदमी मेरी मां को बींधना चाहता है।
मैं इसे अपना जीवन दान दूंगा। तू मेरे मरने पर माता की सेवा करना।
फिर शाखाओं की ओट से निकल 'हे पुरुष ! मेरी मां को मत मार। यह अन्धी
है। बुढापे से दुर्बल है। मैं इसे जीवनदान देता हूँ। तू इसे न मार कर मुझे
मार' कह उससे प्रतिज्ञा करा जाकर तीर के पास बैठा।
उस निर्दयी ने बोधिसत्त्व को बींध, गिराकर फिर उसकी मां को भी
मारने को धनुष उठाया। इसे देख चुल्लनन्दिय ने सोचा—यह मेरी मां को
मारना चाहता है। एक दिन भी यदि मेरी मां जी सके, तो 'प्राण बचे' ही
कहा जाएगा। मैं इसे अपना जीवनदान दूंगा। उसने शाखाओं की ओट से
निकल कर कहा—"भो पुरुष ! मेरी मां को मत मार। मैं इसे जीवन-दान
देता हूँ। तू मुझे मार। हम दोनो भाइयो को ले जाकर हमारी मां को जीवन-
दान दे।" उससे प्रतिज्ञा ले, वह तीर के पास जा बैठा। शिकारी उसे मार
'यह घर पर बच्चो के लिए होगी' सोच, उनकी माता को भी मार, तीनो
जना को लेकर घर की ओर गया।
इस पापी के घर पर बिजली गिर पडी। उसकी भार्य्या और दो लडके
घर के साथ ही जल गए। पृष्ठ-वांस और खम्बा मात्र बचे।
गाँव के दरवाजे पर ही एक आदमी ने उसे देख यह समाचार कहा।
वह स्त्री-बच्चों के शोक से इतना अभिभूत हुआ कि उसी जगह पर मास की
बहँगी और धनुष छोड, वस्त्र उतार, नंगा हो बाँहे पछाड़ रोता हुआ घर गया।
वह खम्बा टूट कर सिर पर गिर पडा। सिर फट गया। पृथ्वी ने विवर दे
दिया। अवीचि नरक से अग्नि-ज्वाला निकली। जब वह पृथ्वी से निगला
जा रहा था, उसने आचार्य्य के उपदेश को याद कर 'इसी बात को देख पाराशर्य
ब्राह्मण ने मुझे उपदेश दिया था' रोते हुए इन दो गाथाओ को कहा—
इदं सदाचरियवचो पारासरियो यदब्रवी,
मासु त्वं अकरा पाप यं त्वं पच्छा कत तपे ॥