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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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उदञ्चनि ] ६
[ जगल में हवा से बहुत सारी दुर्बल लकड़ी टूटकर गिरती है । हे नाग !
यदि तू इससे डरेगा, तो तू निश्चय से कमज़ोर हो जायगा । ]
एतं दुब्बलं कट्ठ, पुरवा आदि वांतो भञ्जति, यह इस जगल मे बहुत
सुलभ है, जहाँ तहाँ है, यदि तू उससे भायसि, तो ऐसा होने पर तो नित्य ही
भयभीत रहने के कारण रक्त-मास क्षीण होकर विसो नून भविस्ससि;
इस बन में तेरे भयभीत होने की बात है ही नही, इस लिये अब से मत डर ।
इस प्रकार देवता ने उसे उपदेश दिया । वह भी उस समय से लेकर
निर्भीत हो गया । शास्ता ने इस धर्मोपदेश को ला, चारो आर्य-(सत्यो)
को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्य प्रकाशित होने पर यह
भिक्षु श्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय हाथी तो यह भिक्षु
था, वृक्ष-देवता में ही था ।

१०६. उदञ्चनि जातक
"सुख बत मं जीवन्त" आदि शास्ता ने जेतवन मे रहते समय 'प्रौढ कुमारी
के साथ आसक्ति' के सम्बन्ध में कही ।
क. वर्तमान कथा
मूल कथा (=वस्तु) तेरहवें परिच्छेद की चूल नारद काश्यप¹ जातक
में आयेगी । उस भिक्षु से शास्ता ने पूछा—"भिक्षु ! क्या तू सचमुच
आसक्त है ?"


¹ चूलनारदजातक (४४७)