जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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तब पिता ने उसे आश्वासन देकर पूछा—"अम्मे ! तूने अपने आप
को सुरक्षित तो रखा है ?"
"हाँ, तात ! मैने अपने आपको (सँभाल कर) रक्खा है।"
उसने उसे घर ले जा विवाह कर, पराये कुल भेज दिया ।
शास्ता ने यह धर्म-देशना सुना, (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर, जातक
का मेल बैठाया । सत्यों (के प्रकाशन) के अन्त में उपासक स्रोतापत्तिफल
में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय का पिता ही इस समय का पिता; लड़की
ही इस समय की लड़की है। लेकिन उस बात को प्रत्यक्ष देखनेवाला वृक्ष-
देवता तो मै ही था ।
१०३. वेरी जातक
"यत्थ वेरी निजसति ." आदि गाथा शास्ता ने जेतवन में रहते समय
अनाथ पिण्डिक के सम्बन्ध से कही ।
क. वर्तमान कथा
अनाथ पिण्डिक ने अपने भोग-ग्राम¹ से लौटते हुए रास्ते में चोरो को देख-
कर सोचा—"रास्ते मे रहना ठीक नही। श्रावस्ती ही जाकर रहूँगा ।"
यह सोच जल्दी जल्दी बैलो को हांक, श्रावस्ती पहुँच, अगले दिन जब विहार
गया, तो शास्ता को यह बात कही। शास्ता ने "गृहपति ! पूर्व समय में भी
पण्डित-जन रास्ते में चोरो को देखकर रास्ते म न ठहर, अपने रहने के स्थान
पर ही चले गये ' कह उसके पूछने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
¹ भोगग्राम=जमींदारी का ग्राम ।