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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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[ २३ ]
विषय पृष्ठ
२३३. थिकण्टक जातक . . . . . . . . . ४११
[ स्वादिष्ट भोजन के वशीभूत मच्छ तीर से बींधा गया । ]
२३४. असिताभू जातक . . . . . . . . ४१४
[ राजकुमार अपनी देवी की ओर से उदासीन हो
किन्नरी की ओर आकृष्ट हुआ । देवी ने सन्मार्ग ग्रहण
किया । ]
२३५. वच्छनख जातक . . . . . . . . ४१७
[ गृहस्थी ने परिव्राजक को गृहस्थ जीवन की ओर
आकृष्ट करना चाहा । परिव्राजक ने गृहस्थ जीवन के
दोष कहे । ]
२३६. बक जातक . . . . . . . . . . ४२०
[ ढोंगी बगुला मछलियो को खाना चाहता था । ]
२३७. साकेत जातक . . . . . . . . ४२१
[ तथागत ने स्नेह की उत्पत्ति का कारण बताया । ]
२३८. एकपद जातक . . . . . . . . ४२३
[ अनेक अर्थपदो से युक्त एकपद । ]
२३९. हरितमात जातक . . . . . . . . ४२५
[ सर्प ने नीले मेण्डक से पूछा—तुझे मछलियो की
यह करतूत अच्छी लगती है ? ]
२४०. महापिङ्गल जातक . . . . . . . . ४२८
[ राजा मर गया था। तब भी द्वारपाल को भय था कि
अत्याचारी राजा यमराज के पास से कही लौट न आवे । ]
१०. सिगाल वर्ग ४३२
२४१. सब्बदाठ वर्ग . . . . . . . . ४३२
[ सब्बदाठ नामक शृगाल ने पृथ्वीजय मन्त्र सीख
लिया था। उसने सब पशुओ की सेना बना वाराणसी नरेश
पर आक्रमण किया । ब्राह्मण ने उपाय से उसे हराया । ]