जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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विषय पृष्ठ
२०२ केळिसील जातक ३०६
[ शक्र ने जरा जीर्ण हाथी घोडे, बैल तथा आदमियो
को तग करने वाले ब्रह्मदत्त का दमन किया । ]
२०३ खन्धवत्त जातक ३१२
[ सर्पों के प्रति मैत्री भावना का माहात्म्य । ]
२०४ वीरक जातक ३१८
[ सविट्ठक ने वीरक की नकल की । वह काई म
फँसकर मर गया । ]
२०५ गङ्गेय्य जातक ३२०
[ गङ्गेय्य सुन्दर है अथवा यामुनेय्य ? दोनो मछलियो
मे कौन अधिक सुन्दर है ? ]
२०६ कुरुङ्गमृग जातक ३२३
[ कुरुङ्ग मृग ने कठफोडे तथा कछुए की सहायता
से अपने को शिकारी से बचाया और उनके प्राणो की
भी रक्षा की । ]
२०७ अस्सक जातक ३२६
[ अस्सक राजा अपनी मृत रानी के शोक से पागल
हो रहा था । वह रानी गोबर के कीडे की योनि म पैदा
हो कर एक कीडे को अस्सक राजा का अच्छा अच्छा
समझती थी । ]
२०८ सुसुमार जातक ३३०
[ मगरमच्छ की भार्या बन्दर का कलेजा खाना
चाहती थी । कपिराज ने उसके पति का बुरी तरह
चकमा दिया । ]
२०६ कककर जातक ३३२
[ पुराना हुशियार बगला शिकारी के फन्दे म नही
आता था । ]