ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
इति, ते हि भेदेन बौद्धैरुच्यन्ते--इति तात्पर्यम् । एवं प्रत्यक्षेण न दृश्यते क्वचित् क्रिया, तदभावात्
[ देवदत्त सम्बन्धी गमनात्मक क्रिया में देश का भेद है, बाहरी देश का सम्बन्ध और भीतरी
देश का सम्बन्ध देवदत्त से सम्भव हो सकता है, कालभेद भी क्रमशः गमनादि क्रिया का अनुमेय
होता है, और आकारभेद एवं स्वरूपभेद दूसरे का पर्यायवाची सम्भव हो सकता है, क्योंकि नील
होता है, श्वेत होता है, शोभायमान होता है और प्रकाशित होता है, इसमें देवदत्त का स्वरूप
भेद मालूम पड़ता है, गमनक्रिया में देश, काल और आकारादि के विषय में किसी का भो
विवाद नहीं है। परिणाम क्रिया में तो मधुर-अम्लादि के स्वरूपभेद से ही कालभेद होता है,
किन्तु उसमें भेद गोचर नहीं होता है। यद्यपि थोड़ी देर के लिए मान लो फिर भी तो देश की
ही स्वरूपता है। अतः देशभेद का कालभेद से अनादर हो गया ] और कालभेद से स्वरूप में भेद
आ जाता है। यद्यपि देश, काल और आकारवाली वस्तुएं केवल आकाररूप में संसक्त रहती
हैं, फिर भी स्थूल दृष्टि को लेकर अवश्य उसमें भेद कुछ रहता है। देश, काल और आकार के
ही भेद से बौद्ध लोग भेद मानते हैं यही अभिप्राय है। एवं प्रत्यक्ष प्रमाण से कोई क्रिया नहीं
दृष्टिगोचर होती हुई दिखाई पड़ती है, प्रत्यक्ष प्रमाण के न रहने पर प्रत्यक्षमूलक अनुमान
श्वेतं श्वेतत इत्येतच्छ्रैत्यत्वेन प्रकाशते ।
आश्रितक्रमरूपत्वादभिधानं प्रवर्तते ॥
कार्यकारणभावेन ध्वनतीत्याश्रितक्रमः ।
ध्वनिः क्रमनिबृत्तौ तु ध्वनिरित्येष कथ्यते ॥
इति । एवं-भूता च क्रिया आत्मनोऽस्येव गच्छति जानाति यतते - इति पूर्वापरीभूततत्तद्धर्मप्रतीतेः,
अङ्गीकृता च ईश्वरात्मवादिभिः । यदाहुः ग्रन्थकारगुरुपादाः—
‘तदिच्छा तावती तावज्ज्ञानं तावत् क्रिया हि सा ।’ इति ।
‘एवं न जातुचित् तस्य वियोगस्त्रितयात्मना ।
शक्या .................................... ॥’ इति ।
‘घटादिग्रहकालेऽपि घटं जानाति सा क्रिया ।’ इत्यादि च ।
जितने भी सिद्ध या असिद्ध वस्तु पदार्थ है उन सबको साध्यरूप से ही कहा जाता है। क्रम
का आश्रय लेने से उसका अभिधान ही मालूम पड़ता है। उन क्रमों के समूह को गुण रूपी अवयवों से
बुद्धिपूर्वक कल्पित भेद मिटाकर एक क्रिया कही जाती है। सफेदी चमक रही है इसमें तो सफेदी रूप से
क्रिया ही प्रकाशित हो रही है ऐसा कहा जाता है। कार्यकारण-भाव से क्रिया ही ध्वनित होती है यही
आश्रित क्रम इसका है, और ध्वनि की निवृत्ति हो जाने पर तो ध्वनि रुक गयी ऐसा ही कहा जाता है।
इस प्रकार क्रिया ही अपने आप में रहती है, जानती है और यत्न करती है। उन-उन धर्मों
से पूर्वोत्तर क्षण में प्रतीत होती है, और ईश्वरात्मवादीने इसको माना भी है। ग्रन्थकार स्वयं इसे
कहते हैं।
इसलिए इच्छा और ज्ञान ही बाद में क्रिया बन जाते हैं ।'
‘इस प्रकार कभी भी उसका अभाव नहीं रहता; घटादि के ग्रहण काल में भी मैं घट को
जानता हूँ—उसीका नाम क्रिया है ।'
अ.-१, आ.-२, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ४९
तत्तत्पूर्वकेन अनुमानेन, कार्यं च ग्रामप्राप्त्याद्युत्तरक्षणरूपं तद्देशवस्तुरूपादि, — इति कार्यान्यथा-
नुपपत्त्यापि न सा कल्प्या ।
एवं प्रत्यक्षानुमानाभ्यां तस्या अदृष्टिः, — इति साधकप्रमाणाभाव उक्तः, बाधकमपि
आह—
न साप्येका क्रमिकैकस्य चोचिता ॥ ९ ॥
तत्र पूर्वापररूपता क्षणानां, न तु स्वात्मनि किंचित् पूर्वम् अपरं वा, वस्तुमात्रं हि तत्,
अतो विकल्पप्राणितं पूर्वापरीभूतत्वं क्रमरूपता क्रियाया लक्षणं न वस्तु किंचित् स्पृशति, ते हि
क्षणा न अन्योन्यस्वरूपाविष्टाः — इति कथम् 'एका' क्रिया ?, क्रमो हि भेदेन व्याप्तः अभिन्ने
तदभावात्, भेदस्य विरुद्धम् ऐक्यम् — इति कथं 'क्रमिका एका च' इति स्यात् ? । अथ एकत्र
आश्रयेऽवस्थानात् एका, तत्रापि तत्क्षणातिरिक्तो न कश्चित् आश्रयोऽनुभूयते, क्षणा एव हि
प्रबन्धवृत्तयो भान्ति । किंच तथाभूतैर्भिन्नदेशकालाकारैः क्रियाक्षणैराविष्ट आश्रयः कथमेकः
प्रमाण से भी दृष्टिगोचर नहीं होती, और कार्य क्या वस्तु है दूसरे क्षण में ग्रामप्राप्ति और
उस वस्तु का उस देश के अनुकूलरूप आदि माना जाता है, अन्यथा कार्य नहीं सिद्ध हो सकता,
इसलिए क्रिया की कल्पना नहीं कर सकते हैं। उत्तर क्षण में होनेवाला ग्रामप्राप्तिरूप आदि
जो भी कार्य है, उस देश वस्तुरूपादि का माना जाता है, अन्यथा कार्य की सिद्धि न होने से भी
क्रिया की कल्पना असम्भव होगी। स्वस्थ देवदत्त दिन में भोजन नहीं करता है यहाँ पर जैसे
स्थूलस्वरूप कार्य को देखकर रात्रि के भोजन की अवश्य अर्थापत्तिप्रमाण से अनुमान की कल्पना
होती है उसी प्रकार यहाँ पर क्रिया की कल्पना नहीं कर सकते हो।
इस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण से क्रिया की प्रतीति दृष्टिगत नहीं होती, इससे
साधक प्रमाण कहा गया। अब बाधक प्रमाण भी दिखाते हैं—
......'वह क्रिया भी एक नहीं होती; क्योंकि क्रिया तो अनन्त हैं और क्रमशः एक क्रिया
का होना समुचित नहीं है ॥ ९ ॥
क्रिया में क्षणों की पूर्वोत्तररूपता रहती है किन्तु अपनी निजी क्रिया में कुछ पूर्वोत्तर-
रूपता नहीं है। क्रिया तो केवल वस्तु का स्वरूप ही है, इसलिए विकल्प ही प्राण-जीवन है जिसका
ऐसी आगे-पीछे होनेवाली क्रमरूपता यह क्रिया का लक्षण नहीं है जो किसी वस्तु-पदार्थ को स्पर्श
करती हो, वे ही सभी क्षण एक दूसरे में नहीं मिली हुई हैं किन्तु भिन्न-भिन्न ही रहती हैं—तब
तुम ही बताओ एक क्रिया कैसे होगी ? क्योंकि क्रम भेद से व्याप्त रहता है एक में क्रम का अभाव
रहने से, भेद के विरुद्ध एकता है इस प्रकार कैसे 'क्रमिका एका च' एक भी हो और क्रमपूर्वक
भी होगी ?
इसके समाधान में कहते हैं कि एक आश्रय में रहने के कारण क्रिया एक है, उसमें उन
क्षणों से भिन्न कोई आश्रय अनुभूत नहीं होता है; क्योंकि वे क्षण ही एकाकाररूप से प्रतीत होते
हैं अन्य किसी की भी प्रतीति नहीं होती। यदि यह मानोगे तो इस प्रकार भिन्न देश, काल और
आकारवाली क्रिया के क्षणों से युक्त आश्रय कैसे एक हो सकेगा ? इसी कारण 'देवदत्तोऽयम्' यह
७
५० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-१०
स्यात् ?, अत एव 'देवदत्तोऽयं, स एव ग्रामं प्राप्तः' इति सादृश्यात् भवन्ती प्रत्यभिज्ञा न ऐक्यं
वास्तवं गमयितुमलम् ॥ ९ ॥
एवं ज्ञानं क्रियां च परीक्ष्य, यस्मिन् सति ते संबद्धे सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्वरूपैश्वर्यप्रसाधनाय
प्रभवतः, तं संबन्धं ध्वंसयितुं तद्विषयं प्रमाणाभावं तावदाह—
तत्र तत्र स्थिते तत्तद्भवतीत्येव दृश्यते ।
नान्यन्नान्योऽस्ति संबन्धः कार्यकारणभावतः ॥ १० ॥
मृत्पिण्डे सति स्तूपकः, तत्र सति शिविको यावत् घटः—इत्येवं भावक्षणा एव उपलभ्यन्ते,
न अधिकं किंचित् प्रत्यक्षेण अवभासते, नापि अनुमानेन—इति क्रियायामिव वाच्यम् । सर्वत्र
आधाराधेयभावादौ अयमेव पन्थाः—पृथग्व्रकुण्डबदरक्षणानन्तरं निरन्तरात्मकविशिष्टकुण्ड-
बदरोदयः इति । अयमेव च भावो भावान्तरेण सह नियतपूर्वापरतया विकल्पेन व्यवह्रियमाणः
कार्यकारणभावः—इति अभिधीयते । नच ज्ञानक्रियाभ्यां सह आत्मनः कार्यकारणभावः
आत्मनस्तत्कार्यत्वाभावात्, ज्ञानस्य च स्वसामग्रीकार्यत्वात्, क्रियायाश्च अभावात्,—इति न
ज्ञानक्रियासंबन्धो यतो ज्ञातृत्व-कर्तृत्वे स्याताम् ॥ १० ॥
एवं प्रमाणं पराकृत्य, संबन्धे बाधकं सामान्यविशेषमुखेन निरूपयति—
जिसने गाँव को प्राप्त कर लिया है। इस प्रकार सादृश्य ज्ञान होनेवाली 'प्रत्यभिज्ञा' एकता को
जनाने में समर्थ नहीं हो सकती ॥ ९ ॥
इस तरह ज्ञान और क्रिया की परीक्षा कर जिसके रहने पर उन ज्ञान और क्रियाओं का
सम्बन्ध सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्वरूप ऐश्वर्य प्रसाधनार्थ उत्पन्न होते हैं उस सम्बन्ध को ध्वंस करने के
लिए सम्बन्ध के विषय में प्रमाण का अभाव बताते हैं—
उस-उस कारण के रहने पर वह-वह कार्य होता है यही देखा जाता है । कार्य-कारणभाव
से दूसरा कोई अन्य सम्बन्ध नहीं है ॥ १० ॥
मृत्पिण्ड के रहने पर दण्ड और दण्ड रहने पर शिविका [ डोरी जो तैयार हुए घट को चक्र
से अलग करने के लिए रखी जाती है ] घट के तैयार होने तक, ये सभी भावरूपी क्षण ही उपलब्ध
होते हैं, उससे कुछ अधिक वहाँ पर प्रत्यक्षरूप से अवभासित नहीं होता और जिस प्रकार से क्रिया
में अनुमान कर लेते हो वैसा यहाँ पर अनुमान से भी काम नहीं होगा। इसी ढंग से आधार-
आधेयभावादि फल रहा, जब पुनः कुछ क्षणों के बाद बेर फल रख दिया गया तब लगातार रूप
से विशिष्ट कुण्डवाले बेर फल की व्युत्पत्ति होने लगती है और यही पदार्थभाव के बिना दूसरे
भाव के साथ विकल्प द्वारा ठीक पूर्वोत्तर रूप से व्यवहार किया हुआ कार्य-कारणभाव कहा जाता
है । ज्ञान और क्रिया के साथ आत्मा का कार्य-कारणभावरूप सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि आत्मा
उसका कार्य नहीं है । ज्ञान अपने उत्पादक सामग्री की अपेक्षा रखता है; क्रिया का भाव न होने
से, इसीलिए ज्ञान और क्रिया का सम्बन्ध नहीं है जिससे ज्ञातृत्व-कर्तृत्व हो ॥ १० ॥
इस प्रकार सम्बन्ध में साधक प्रमाण को हटाकर, अब सम्बन्ध में जो बाधक प्रमाण दिये
हुए हैं उन्हें भी सामान्य-विशेषरूप से निरूपण करते हैं—
अ.-१, आ.-२ का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ५१
द्विष्ठस्यानेकरूपत्वात्सिद्धस्यान्यानपेक्षणात् ।
पारतन्त्र्याद्ययोगाच्च तेन कर्तापि कल्पितः ॥ ११ ॥
संबन्धस्तावत् परस्परप्राप्तिरूपो द्वयोः प्राप्तिभाजोरेकस्तिष्ठति, — इति सामान्यलक्षणम् ।
तच्च कथं, ? नहि एकत्र विश्रमिताशेषशरीरसारोऽन्यत्र विश्रमितुम् अलं, स्वरूपभेदप्रसङ्गात् ।
एतेन संयोगसमवायौ तन्मूलाश्च अन्येऽपि संबन्धा बाधविधुरां धुरम् अध्यारोपिता मन्तव्याः ।
योऽपि चेतनेषु तत्कल्पनया च अचेतनेषु पारतन्त्र्यात्मा संबन्धो व्यवह्रियते, तत्र सिद्धस्य न
पारतन्त्र्यम् अस्ति सिद्धत्वादेव, असिद्धस्य नतरां निःस्वरूपस्य ताद्धर्म्यायोगात् । एवमपेक्षायामपि
वाच्यम् । द्वे च रूपे कथं श्लिष्यतो ? द्वयोरेकत्वानुपपत्तेः; एकत्वे वा कः श्लेषः, ? तस्मात्
ज्ञानसंबन्धात् 'ज्ञाता' इति यथा विकल्पकल्पितोऽर्थो न वस्तु तथा क्रियासंबन्धात् 'कर्ता' इत्यपि
कल्पनामात्रम् — इति पूर्वपक्षः ॥ आदितः ॥ १६ ॥
इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायां प्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां ज्ञानाधिकारे
पूर्वपक्षविवृतिर्नाम द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥
•
अनेक रूप होने से सम्बन्ध दो पदार्थों का होता है, सिद्ध को किसी अन्य की अपेक्षा नहीं
होने के कारण और परतन्त्रता का योग होने से कर्ता भी कल्पित है ॥ ११ ॥
परस्पर प्राप्तिरूप सम्बन्ध दो पदार्थों का होता है प्राप्त करनेवाले दोनों के बीच में एक ही
रहता है यही सामान्य लक्षण है और वह कैसे है ? एक जगह में पूरा थका हुआ शरीर दूसरी
जगह परिश्रम करने के लिए समर्थ नहीं होता, स्वरूप का भेद होना चाहिए । तभी वह कार्य
सम्बन्ध रख सकता है । इसी कारण संयोग और समवाय एवं तन्मूलक दूसरे सभी सम्बन्ध बाध
से खण्डित होनेवाले में से हैं उससे आरोप किया गया है यह बात माननी पड़ेगी । जो चेतन में
कल्पित की कल्पना भी अचेतन में पारतन्त्र्यरूप सम्बन्ध का व्यवहार होता है; क्योंकि सिद्ध वस्तु
में परतन्त्रता नहीं रह सकती, सिद्ध होने के कारण । असिद्ध वस्तु में कोई रूप न होने से निश्चय
हो कर्तृत्वादि धर्म का योग रहता है, इस प्रकार अपेक्षा में भी कहना चाहिए । दो रूप एक में
कैसे रहेंगे ? क्योंकि दो रूप एक नहीं बन सकता; या एकता में कौन-सा सम्बन्ध रहेगा ? इसलिए
ज्ञान सम्बन्ध से ज्ञाता कल्पित है । इसी प्रकार विकल्प से कल्पित अर्थ वस्तु पदार्थ सत्य नहीं
होता तथा क्रिया सम्बन्ध से 'कर्ता' यह भी कल्पना मात्र है ॥ ११ ॥
द्वितीय आह्निक समाप्त
१. 'राज्ञः' ऐसा कहने पर निराकांक्षा की प्रतीति राजा के जैसी नहीं होती, अपि तु 'राजा' इस कथन में
अन्य की आकांक्षा राजा शब्द रखता है, इसलिए वह आकांक्षा किसी सम्बन्ध की आकांक्षा रखती हुई
सब जगह से व्यवस्थित होकर रहती है—इससे सिद्ध होता है कि अपेक्षा ही सम्बन्ध है, ऐसा लोक में
व्यवहार भी देखा जाता है और करना भी चाहिए—इस पर आशंका कर उत्तर में कहते हैं—
'अपेक्षायामिति' ऐसा—'अपेक्षा में कहना चाहिए।' जैसा कि कहा भी गया है।
अपेक्षा का स्वरूप तो पराधीन-परतन्त्र रहता है वह किसी दो में सम्बन्ध स्थापित नहीं कर
सकता है । अर्थात् जड और अजड इन दोनों में सम्बन्ध नहीं होता; असम्भव होने से…………।'
अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे परदर्शनानुपपत्त्याख्यं
तृतीयमाह्निकम्
विना येन न किंचित्स्यात्समस्ता अपि दृष्टयः ।
अनस्तमितसंबोधस्वरूपं तं स्तुमः शिवम् ॥
एतस्मिन् पूर्वपक्षे यदुक्तं स्मृतेः संस्कारमात्रादेव सिद्धिः—इति, तदेव दूषयितुं ‘सत्यं ⋯ ।’
इत्यादि ‘⋯ ज्ञानस्मृत्यपोहनाशक्तिमान् ॥’ इत्यन्तं श्लोकसप्तकम् । क्रियायां संबन्धे च दूषणोद्धरणं
जिसके बिना समस्त ज्ञानरूप दृष्टि कुछ भी प्रकट नही कर सकती है। हमलोग उस
संतत आभासरूप बोधात्मा शिव की स्तुति करते हैं।
पूर्वपक्ष में कहा गया था कि स्मृति की संस्कार मात्र से ही सिद्धि हो जाती है [ इस
पूर्वपक्ष में दो अधिकार से सिद्धान्त का निरूपण किया जाता है जो कि ‘स्वलक्षणाभासं’ इत्यादि
से पीठबन्ध—‘भूमिका’ बाँधकर ‘संस्कारात् स्मृतिसिद्धौ स्यात् स्मर्ता द्रष्टेव कल्पितः’ इसलिए
यह ज्ञान विचार वाला अधिकार है, और क्रिया सम्बन्ध का विचार-विमर्श द्वितीय अधिकार में
होगा। ज्ञानशक्ति के योग से ज्ञाता का ज्ञान-अधिकार में विचार होगा, क्रियाशक्ति के योग से
कर्ता का क्रियाधिकारमें दृढ किया जाता है। वस्तुतः ज्ञानाधिकार के क्रम से समस्त शास्त्र के
अर्थ का आक्षेप हो जाता है, ज्ञान के व्याज से कर्तृता का समर्थन शुद्ध स्वातन्त्र्यरूप ऐश्वर्य
‘कर्तरि ज्ञातरि आदि सिद्धे महेश्वरे’ इस कारिका रूपा सूत्र में दिखा दिया। जैसे ज्ञानविषय
में यथारुचि संयोजन-वियोजनरूप स्वातन्त्र्य है उसे प्रकाश और विमर्शरूप से बताया है
उसमें प्रकाश भाग मात्र को प्रधान बना कर ज्ञानाधिकार का विचार किया जाता है, और
विमर्श को प्रधानता में क्रियाधिकार होगा। एक अंश के द्वारा धर्मी में पूर्णता का प्रवेश नहीं
होता। इसलिए शुद्ध स्वातन्त्र्य रूप कर्तृत्व ही यहाँ पर पूर्ण है—ऐसा मानना चाहिए। ]
बौद्धों ने कहा है कि स्मृति की सिद्धि संस्कार मात्र से हो सम्पन्न हो जायेगी; इसका
खण्डन दोष देकर किया जायेगा।
‘सत्यं ⋯⋯⋯⋯⋯ इत्यादि से लेकर ‘ज्ञानस्मृत्यपोहनाशक्तिमान् ॥’ सात श्लोकों तक।
क्रिया और सम्बन्ध में जो दोष दिया है उसका निराकरण क्रियाधिकार नामक द्वितीय भाग में
अजडों में तो वह होती है, उसमें भी सम्बन्ध तो दो में ही होता है इस कारण वह एक वस्तु-
पदार्थरूप में नहीं रहती; चूँकि इसका उपकार करना रूप ही सम्बन्ध मात्र कारण माना जाता है
और अपेक्षित जो होता है वह तो कार्य ही कहलाता है, किन्तु ऐसा कहना युक्तियुक्त नहीं दिखायी
पड़ता। जब कि इस विषय में कहा भी है।
यदि अपेक्षा को ही सम्बन्ध माना जाय, तो वह सम्बन्ध के अभाव में कैसे अपेक्षा रख सकती
है। इसलिए जिसका स्वभाव वैसा नहीं होता है उसका स्वभाव कैसे बन सकता है—ऐसा होना तो
सम्भव नहीं दिखायी देता।
अ.-१, आ.-३, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ५३
द्वितीये क्रियाधिकारे भविष्यति । यत्तु परेण व्यतिरिक्तं ज्ञानं काणादसांख्यादिदृष्टौ निराकृतं
तदभिमतमेव । ग्रन्थकृतः—इति तत् दूषणान्तमेव । तत्र श्लोकद्वयेन ज्ञानस्य स्वसंवेदनरूपतया
अनुभवस्य स्मृतौ अप्रकाश्यत्वं दर्शितं संस्कारजत्वेऽपि । ततः श्लोकद्वयेन स्मृतेः भ्रान्तित्वम्
आशङ्कापूर्वकं पराकृत्य तृतीयेन प्रसङ्गात् सर्वाध्यवसायानामपि भ्रान्तित्वाशङ्का शमिता । ततः
सत्यपि संस्कारे स्मृत्यनुपपत्तौ व्यवहारोच्छेदः,—इति श्लोकेन उक्त्वा स्वपक्षे तदुपपत्तिः,—इति
श्लोकेन उक्तम्—इति तात्पर्यम् । ग्रन्थार्थस्तु निरूप्यते—
सत्यं किंतु स्मृतिज्ञानं पूर्वानुभवसंस्कृतेः ।
जातमप्यात्मनिष्ठं तन्नाद्यानुभववेदकम् ॥ १ ॥
पूर्वपक्षमध्यात् मया तावत् बहु अङ्गीकर्तव्यम्,—इति 'सत्यम्' इत्यनेन दर्शितम्, यत्तु न
अङ्गीकर्तव्यं तत् दूष्यते,—इत्येतदुक्तं 'किंतु' इत्यनेन विशेषाभिधायिना । इह स्मृतौ विषयमात्रस्य
प्रकाशो न समर्थनीयो वर्तते यः संस्कारादेव सिद्धयेत्, किंतु अनुभवप्रकाशेन विना 'तत्' इत्येवं-
रूपा कथं स्मृतिः स्यात्, कथं च तया विना अभिलाषेण [ पेन ] व्यवहारः स्यात् ?, अनुभवेन हि
अस्य सुखसाधनता निश्चिता, तत उपादानम्; तत्र पूर्वानुभवजनितात् संस्कारात् एतावत् जातम्-
होगा । काणाद और सांख्यादि की दृष्टि में ज्ञान एक भिन्न वस्तु है । इस विषय में बौद्धोंने दोष
दिखलाया है, यह तो शैवाद्वैत-सिद्धान्त के लिए अभीष्ट ही है जो दोष हमें उन्हें देना था वह
तो बौद्धोंने ही दे दिया है । दो श्लोकों से ज्ञान का स्वसंवेदनरूपता से अनुभव की स्मृति में
अप्रकाशयता दिखायी, संस्कार से उत्पन्न होने पर भी अनुभव के बिना हो जाती है अनुभव की
कोई स्मृति में आवश्यकता नहीं होती । इसके बाद दो श्लोकों से स्मृति में भ्रान्तिता की शङ्का को
लेकर खण्डन कर, तृतीय श्लोक से प्रसङ्गवशात् समस्त अध्यवसायों में भी भ्रान्तिता की शङ्का
का उपशमन करेंगे । अनन्तर संस्कार के रहने पर भी स्मृति की सिद्धि न होने से व्यवहार का
उच्छेद हो जायेगा ऐसा एक श्लोक से कहकर अपने पक्ष में उसकी उपपत्ति हो गयी, जो बात
हमने उठायी थी उसे एक श्लोक से कह दिया । यही इस आह्निक का सारांश है ।
अब ग्रन्थ के अर्थ का निरूपण किया जाता है ।
कणाद और सांख्यदर्शनों में ज्ञान भिन्न नहीं होता है ऐसा उनका मानना तो हमें अभीष्ट
ही है; इस प्रकार आर्य पूर्वपक्षो के प्रति सुहृद् होकर प्रसन्न होते हैं 'सत्यं' इस शब्द द्वारा प्रयोग
कर 'सत्य है' परन्तु वह स्मृतिज्ञान है । क्योंकि पूर्व अनुभव के संस्कार से वह उत्पन्न होता है ।
स्मृतिरूप ज्ञान पूर्वानुभव संस्कार से यद्यपि उत्पन्न होता है और उत्पन्न होकर अपने में ही रहता
है वह आद्य अनुभव का वेदक नहीं होता है ॥ १ ॥
पूर्वपक्ष के बीच से हमें बहुत कुछ लेना है, यह बात 'सत्यम्' शब्द से दिखाई गयी है ।
जिसको स्वीकार नहीं करना है उस विषय को 'किन्तु' इस विशेष शब्द से दूषित किया गया
है । स्मृति में विषय भाग के प्रकाश का समर्थन नहीं किया जाता जो कि संस्कार से सिद्ध हो
जाता है, किन्तु अनुभव प्रकाश के बिना वह इस प्रकार स्मृति कैसे होगी ? और कैसे उसके
बिना व्यवहार सम्भव हो सकेगा ? अनुभव से तो इसकी सुख-साधनता का ही निश्चय होता
है तब उसका ग्रहण भी होता है; उसमें पूर्वानुभव के संस्कार से वह उत्पन्न होता है यद्यपि वह
५४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-२
यद्यपि तज्ज्ञानं विषयेण न जनितं, तथापि तद्विषयम्—इति । नच एतावता किंचित्, आत्मनिष्ठे
स्वप्रकाशज्ञाने विषयस्येव अनुभवस्य प्राच्यस्य अप्रकाशनात् ॥ १ ॥
ननु संस्कारजत्वादेव प्राच्यमनुभवमपि विषयीकुरुतां स्मृतिः— इत्याशङ्कयाह—
दृक्स्वाभासैव नान्येन वेद्या रूपदृशेव दृक् ।
रसे संस्कारजत्वं तु तत्तुल्यत्वं न तद्गतिः ॥ २ ॥
‘दृक्’ ज्ञानं, तच्च जडात् विभिद्यते स्वप्रकाशैकरूपतया, जडो हि प्रकाशात् पृथग्भूतो
वक्तव्यः, तेन दृक् ‘स्वाभासा’ आभासः प्रकाशमानता सा स्वं रूपमव्यभिचारि यस्याः, स्वस्य च
आभासनं रूपं यस्याः । सत्यपि बाह्ये तच्छरीरसंक्रान्तं न प्रकाशनं ज्ञानस्य रूपं भवितुमर्हति,
परप्रकाशनात्मकनिजरूपप्रकाशनमेव हि स्वप्रकाशत्वं ज्ञानस्य भण्यते । ननु स्वाभासमेव सत् तत्
अनुभवज्ञानं स्मरणे भासिष्यते, न—इत्याह ‘नान्येन वेद्या’ । परत्र यदि दृक् भासेत तर्हि न सा
स्वाभासा, इदमेव हि स्वप्रकाशस्य लक्षणं—स्वयं हि यदि प्रकाशेत तदा परेण सह असंबन्धात्
संबन्धप्राणा कथं ‘परत्र’ इति सप्तमी संगच्छताम्; तथा च रूपज्ञानेन ‘रसे दृक्’ रसविषयं ज्ञानं
न वेद्यते, एवं हि चक्षुषैव रसः फलतो गृहीत एव स्यात् । ननु यदि न आभाति स्मरणेऽनुभवः
ज्ञान विषय से पैदा हुआ है फिर भी वही उसका विषय है यह आत्मनिष्ठ अपने प्रकाश ज्ञान में
जैसा विषय का भान होता है वैसा पूर्वानुभव का नहीं होता ॥ १ ॥
अब शङ्का करते हैं कि—संस्कार से पैदा होने के कारण स्मृति यदि पूर्व के अनुभव को
भी विषय करे तो इसका उत्तर देते हैं—
ज्ञान के स्वभाव से ही रूप की दृष्टि के समान वह दृष्टि भी वेद्य है किसी दूसरे से नहीं ।
इसमें संस्कार से पैदा होना तो है किन्तु उसको समानता को प्राप्त करना नहीं है ॥ २ ॥
‘दृक्’ दृष्टिज्ञान जडवस्तु से अत्यन्त भिन्न होता है, क्योंकि ज्ञान अपने प्रकाश से प्रकाशित
है और जड वस्तु तो प्रकाश से भिन्न होती है ऐसा जड वस्तु के विषय में कहना समुचित ही
है, इसलिए ‘दृक्’ ज्ञान अपने आभास से आभासित रहता है उसका अर्थ यही है कि—जो स्वयं
अव्यभिचरत रूप से प्रकाशित है और जिसका स्वरूप अपने से भासित है। बाह्य शरीर में जो
संक्रान्त रहता है वह प्रकाशन ज्ञान का स्वरूप नहीं हो सकता, दूसरे अन्य को प्रकाशित करना
एवं अपने स्वयं प्रकाशित रहना यही ज्ञान का स्वप्रकाशत्व कहलाता है ।
‘ननु’ कहकर शंका करते हैं कि—अपना आभास ही यदि अनुभव ज्ञान के रूप में मानते
हो, तो वही स्मरणमें भी भासित होगा, ऐसा नहीं हो सकता है ‘नान्येन वेद्या’ वह दूसरे किसो से
वेद्य नहीं होता । यदि दूसरी जगह ‘दृक्’ ज्ञान भासित होता हो तो उसे स्वाभास ( अपने आभास
से आभासित होने वाला ) नहीं कहा जा सकता है । यही स्वप्रकाश का लक्षण है, स्वयं यदि
प्रकाशित होता हो तो दूसरे से सम्बन्ध नहीं होने के कारण उसे सम्बन्धप्राण कैसे कहेंगे, ‘परत्र’
में सप्तमी विभक्ति कैसे संघटित होगी; इसलिए रूपज्ञान के साथ ‘रसे दृक्’ रस विषयक ज्ञान
नहीं जाना जा सकता है, ऐसा कहने पर तो फिर चक्षु-इन्द्रिय से भी रसका ग्रहण होने लगेगा।
१. परस्पर एक-दूसरों के संवेदन ज्ञान में अन्योऽन्य एक-दूसरों का विषय ज्ञान भी होता है। वैसा स्वीकार
करने से तो इन्द्रियों के नियम विनष्ट हो जायेंगे । वह नियम तीन प्रकार का होता है। इन्द्रिय के
अ.-१, आ.-३, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ५५
किं र्तार्ह संस्कारेण कृतं स्यात्, रूपज्ञानं न रसज्ञानजात् संस्कारात् जातं, तत् कथम् अयं प्रसङ्गः,
तस्मात् संस्कार एव भवत्संभावितदोषभङ्गाय प्रभवेत्; नैतत्, यतो हि असौ तत्संस्कारसंस्कृतात्
समनन्तरप्रत्ययात् उत्थितः स्मृतिबोधः, तेन तत्सदृशो भवतु शाखासंनिवेश इव पूर्वसंनिवेशतुल्यः,
नतु यो यत्संस्कारात् जातः स तस्य वेदनस्वभावो भवति—इति युक्तम् । सदृशत्वस्यापि गति-
रवगमः कथम् ?, नहि अनुभवज्ञानं सादृश्यं गमयति, नापि स्मृतिज्ञानं, परस्परम् असंवेदने
द्वयनिष्ठसादृश्याध्यवसायायोगात्, अन्यस्य च तदुभयवेदनरूपस्य अभावात्,—इति संस्कारात्
परं सविषयतामात्रं स्मृतेः सिद्धं, नतु अनुभवविषयत्वं, नापि अस्य विषयस्य पूर्वानुभवविषयीकृत-
त्वम्—इति निश्चय एषः ॥ २ ॥
ननु यदि स्मृतिज्ञाने अनुभवस्य सत्यतः प्रकाशः स्यात्, तन्मुखेन च तद्विषयस्य, तदा
भवेत् भवदुक्तेरवकाशः, यावता स्मृतिर्विकल्परूपत्वात् केवलमप्रकाशमानमेव अनुभवं तद्विषयं च
अध्यवस्यति, तत् इयं भ्रान्तिस्वभावा, तत्र कोऽयं निर्बन्धः ?, तदेतत् दर्शयति शङ्क्यमानत्वेन—
अथातद्विषयत्वेऽपि स्मृतेस्तदवसायतः ।
दृष्टालम्बनता भ्रान्त्या
जब कि इष्ट नहीं है । चक्षु-इन्द्रिय से जन्य ज्ञान रूप का प्रकाश करता है अर्थात् चक्षु रूपविषयक
ज्ञान को ही पैदा करता है—दूसरा नहीं करा सकता है ।
पुनः शंका करते हुए कहते हैं कि यदि स्मरण में अनुभव नहीं होता है तो उसमें संस्कार
फिर क्या काम करेगा, रूपज्ञान रसज्ञान से होनेवाले संस्कार से नहीं उत्पन्न होता है, तब फिर
ऐसा प्रसंग कैसे उपस्थित होगा । इसलिए संस्कार ही आपके प्रदर्शित दोष को दूर करने के लिए
समर्थ होगा । यह तो हो ही नहीं सकता है, क्योंकि वह बाद के ज्ञान से होनेवाला स्मृति ज्ञान है,
इसलिए उसके समान भले ही हो, जैसे—खींची हुई वृक्ष का शाखा पुनः छोड़ देने पर अपने
नियत स्थान में वापस चली जाती है, जो संस्कार से उत्पन्न होता है उसका वैसा स्वभाव
नहीं होता है वह ज्ञानस्वरूप वाला होता है—ऐसा कहना तो युक्ति-युक्त भी है । सदृशका ज्ञान
होना भी तो बड़ा कठिन है ? अनुभव-ज्ञान, सादृश्य-ज्ञान का बोध नहीं कराता है और न तो
स्मृतिज्ञान ही बोध कराता है, अज्ञान में ही सादृश्य दो के ज्ञान से होता है और दूसरे में तो
दोनों के ज्ञान का अभाव रहता है, इसलिए संस्कार के बाद ही दूसरा स्वविषयता मात्र स्मृति से
सिद्ध होता है—न तो वह अनुभव का विषय होता है, और न उसके विषय का पूर्व का अनुभव
ही विषय करता है—यही इसका निश्चय है ॥ २ ॥
यदि अनुभव का स्मृति के ज्ञान में सत्य रूपसे ठीक-ठीक प्रकाश होता है—तब तो, उसके
द्वारा विषय का भी प्रकाश होता है इससे फिर आपकी युक्ति को अवकाश ( स्थान ) मिलेगा,
जब कि स्मृति विकल्प रूप से केवल अप्रकाशित ही अनुभव और उसके विषय को देखती है,
इसलिए यह भ्रम का स्वभाव है फिर उसमें क्या विचार करना होगा ? इसी बात को शंका कर
दिखाते हैं ।
सामर्थ्य बल से ज्ञान का नियम है; क्योंकि नेत्र-इन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान ही रूप का प्रकाश करनेवाला होता
है । इन्द्रिय की योग्यता ही इसी में होती है कि नेत्र रूपसम्बन्धी ही ज्ञान पैदा करे दूसरा कुछ नहीं ।
५६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-३-४
न तद्दर्शनं नापि तद्विषयः स्मृतेर्विषयः, तथापि तु उभयम् अध्यवसीयते, भ्रमरूपतया
स्मृतेः॥ एतत् निराकरोति—
तदेतदसमञ्जसम् ॥ ३ ॥
अत्र कारिकया उपपत्तिम् आह—
स्मृतिर्तैव कथं तावद्भ्रान्तेश्चार्थस्थितिः कथम् ।
पूर्वानुभवसंस्कारापेक्षा च किमितीष्यते ॥ ४ ॥
अनुभूतस्य अनुभवप्रकाशितस्य विषयस्य अप्रमोषोऽनपहारः तथैव प्रकाशनं यत् एतत्
स्मृतेः आत्मीयं रूपं तथाप्रकाशनाभावे विघटेततमाम् । किंच भ्रान्तौ असद्वा आत्माकारो वा
प्रख्याति, नतु तया अर्थः स्वीक्रियते तस्य अप्रकाशनात्—इति तया अर्थो न व्यवस्थापित एव ।
प्रकाशनात्मा हि व्यवस्थापना, ततश्च स्मरणादभिलापेन कथम् अर्थविषयो व्यवहारः ?; नच
तदप्रकाशने संस्कारजत्वेन किंचित् कृत्यं, तद्धि सादृश्यं लब्धुम् अवलम्ब्यते; नच अनुभवेन
यदि अनुभव और उसके विषय को स्मृति विषय नहीं करेंगी तो अन्ततोगत्वा प्रत्यक्ष-
प्रमाण के आलम्बन करने से उसकी भ्रान्ति हो जाती है, इसका निराकरण करना सन्देह में डूब
जायेगा । अनुभव को देखना और उसके विषय को देखना यद्यपि यह स्मृति का विषय नहीं है
फिर भी दोनों भ्रमरूप से स्मृति के द्वारा देखे जाते हैं। उनका निराकरण करना असमञ्जस
हो जायेगा ॥ ३ ॥
यहाँ पर कारिका के द्वारा उपपत्ति दिखाते हैं—पहले स्मृति कैसे होगी और भ्रान्ति से
पदार्थ की स्थिति कैसे होगी ? पूर्व अनुभव के संस्कार की अपेक्षा ही फिर किसके लिए
होगी ॥ ४ ॥
जो अनुभव से प्रकाशित विषय है उसका भुलावा नहीं होता उसी प्रकार यह प्रकाशन जो
स्मृति का अपना रूप है उसके प्रकाशन का अभाव होने पर ये दोनों अत्यन्त विघटित हो जायेंगे ।
और भी सुनो, भ्रान्ति होने पर अभाव या उसका अपना आकार प्रकट होता है, उससे पदार्थ का
ग्रहण नहीं होता, क्योंकि वह अप्रकाशित रहता है, इसीलिए उस प्रख्याति से अर्थ व्यवस्थित ही
नहीं हुआ । प्रकाशित होना ही व्यवस्थित होना है, इसलिए स्मरण के कहनेसे अर्थविषयक
व्यवहार कैसे होगा ? और उसके अप्रकाशित रहने पर संस्कार से उत्पन्न होनेवाला कोई कृत्य ही
नहीं रह जाता, फिर भी वह सादृश्य खोजता है; और विषय-प्रकाश करने वाले अनुभव के
१. अनुभूत विषय का विनष्ट नहीं होना और बीच में कुछ काल लुप्त होने के समान पूर्ण रूप से नहीं छिप
जाना, प्रकाश के बल से पुनः प्राप्त हो जाना ही स्मृति का मुख्य रूप है।
विषयप्रकाशनात्मना स्मृत्यभिधानाया भ्रान्तेः किंचिदपि सादृश्यम् अस्ति, सर्वथा विषयम-
स्पृशन्त्याः ॥ ४ ॥
ननु योऽनुभवो यश्च तद्विषयः स यतः तया अध्यवसीयते, ततः अंशात् सादृश्यम् अनुभवेन
स्मृतेः, तत्सिद्धये च संस्कारपरिग्रहः । 'अध्यवसीयते' इति किम् उच्यते ? 'प्रकाशयते' इति चेत्
न भ्रान्तित्वं; 'न प्रकाश्यते' इति चेत् पुनरपि विषयो न स्पृष्ट एव अनया,—इति सादृश्यमपि
शब्दगडुमात्रम्; तदेतत् दर्शयितुमाह—
भ्रान्तित्वे चावसायस्य न जडाद्विषयस्थितिः ।
इह स्मृतेः अन्यस्य वा भ्रान्तिबोधस्य स्वसंवेदनांशे प्रकाशमाने न भ्रान्तिता, तत्र
वैपरीत्याभावात्; यस्तु तत्र अध्यवसीयते स्वाकारः स विपरीततया अस्वाकारत्वेन अर्थतया,—
इति तत्र अंशे भ्रान्तिता । स च अंशोऽर्थलक्षणो न स्मृत्या अन्यया वा भ्रान्त्या स्पृश्यते, तत्र असौ
तूष्णीका,—इति बलादेव तत्र अंशे जडत्वम् अस्या आयातं घटज्ञानस्येव पटे । नच जडेन विषयस्य
किंचित् कृत्यम्, ततश्च अर्थविषयो व्यवहारो विलुप्येत ।
ततोऽजाड्ये निजोल्लेखनिष्ठान्नान्नार्थस्थितिस्ततः ॥ ५ ॥
साथ स्मृति कही जाने वाली भ्रान्ति का कोई सादृश्य नहीं है, क्योंकि वह विषय को स्पर्श नहीं
करती है ॥ ४ ॥
अब शंका करते हैं कि जो अनुभव और उसका विषय जितना जाना जाता है उतने अंश में
तो अनुभव का स्मृति से सादृश्य सिद्ध हुआ, और उसकी सिद्धि के लिए संस्कार का भी ग्रहण
करना पड़ेगा । 'अध्यवसीयते' इसका आप क्या अर्थ करते हैं ? यदि 'प्रकाशयते' ऐसा इसका अर्थ
करते हो तो फिर भ्रान्ति नहीं हुई 'न प्रकाश्यते' प्रकाशित नहीं है ऐसा अर्थ यदि करते हो तो भी
स्मृति द्वारा विषय का स्पर्श नहीं हुआ, सादृश्य भी तो निरर्थक मात्र शब्द रह गया; इसीको
दिखाने के लिए कहते हैं—
भ्रान्ति होनेपर ज्ञान की जड से विषय स्थिति नहीं होती है ।
यहाँ स्मृति का या उससे भिन्न भ्रान्ति के ज्ञान का अपना ज्ञानांश प्रकाशित होनेपर
भ्रान्तिता कहाँ रहेगी; क्योंकि उसमें विपरीतता नहीं है; जब कि उसमें अपनी आकारता का भान
होता है वह विपरीत होकर अपना आकारत्व ही भिन्न अर्थरूप द्वारा उस अंश में भ्रान्ति ही
होती है । और अर्थरूप वह अंश स्मृति से या भ्रान्ति से नहीं स्पृष्ट होता है, वह वहाँ मौन है,
इसलिए बलात् उस अंश में उसकी जड़ता आ जाती है । जैसे घटज्ञान की घटमें और जड
वस्तुका विषय के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता है, इससे भी अर्थविषयक व्यवहार लुप्त हो
जायेगा ।
इसलिए चैतन्य में अपनी और उल्लेख को निष्ठा से अर्थ की स्थिति नहीं रहती
है ॥ ५ ॥
८
५८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-६
अथ तु तम् अवसायरूपं स्वसंवेदनांशं स्वाकारं वा अवलम्ब्य अजडत्वम् अस्याः, एवमपि
'अजाड्ये निजं' स्वसंवेदनम् 'उल्लेखश्च' स्वाकारः-इति इयति एषा परिनिष्ठिता स्मृतिः, - इति
विषयस्य नामापि ग्रहीतुम् अशक्नुवतः 'ततः' स्मृत्यध्यवसायात् कथं विषयस्य व्यवस्थापनं
व्यवहार्यत्वसंपादनसामर्थ्यम् ? ॥ ५ ॥
संस्कारे सत्यपि स्मृतिः न कथंचन घटते, ततश्च परस्परसङ्गतिहीनानि सकलानि
ज्ञानानि, - इति यदुक्तं श्लोकपञ्चकेन तत् इदानीं प्रकृते योजयति-
एवमन्योन्यभिन्नानामपरस्परवेदिनाम् ।
ज्ञानानामनुसंधानजन्मा नश्येज्जनस्थितिः ॥ ६ ॥
'जनस्य' लोकस्य या काचन 'स्थितिः' व्यवहारः सा सर्वज्ञानानां यत् 'अनुसंधान' एक-
विषयभावोपपन्नस्मृतिताप्राप्तिरूपं, तत्र आयत्ता । तथा हि-स्मरणनिबन्धनः सर्वो व्यवहारः ।
प्रथममपि हि प्रत्यक्षज्ञानम् 'अहम्' इति पूर्वापररूपानुसंधानेन स्मरणानुप्राणितेन बिना न घटते,
प्रमातरि विश्रान्त्यभावात् अप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् । एवं सुखादौ मन्तव्यम् । हानादानप्रेरणा-
भ्युपगमादयस्तु व्यवहाराः स्मरणमया एव । 'एवं ज्ञानानां' यत् 'अनुसंधानं' ततो जायमाना
'जनस्थितिः' 'एवम्' इति पराभ्युपगमे सति 'नश्येत्' नश्यति-इति संभाव्यते । कुतः ?-इति
ज्ञानरूप स्वसंवेदन अंश का अवलम्बन कर, या अपने आकार का अवलम्बन करके इस
स्मृति को चेतन मानोगे तो, ऐसा भी 'अजाड्ये निजं' जो चेतन में अपना ज्ञान या उल्लेख
अर्थात् अपने आकार का ज्ञान-इतने में ही यह स्मृति निश्चित हो जाती है, जिस विषय का
नाम लेनेमें भी असमर्थ होते हैं 'ततः' उसी कारण स्मृति के ज्ञान से कैसे विषय का व्यवस्थापन
होगा और व्यवहार के सम्पादन में सामर्थ्य होगा ? ॥ ५ ॥
संस्कार के रहने पर स्मृति किसी प्रकार से भी नहीं घटती है, इसलिए सकल ज्ञान परस्पर
सङ्गति से शून्य होते हैं, जिसको पाँच श्लोकों से कहा गया था; उसको अब प्रकृत प्रसङ्ग से
बता देते हैं-
इस प्रकार परस्पर एक दूसरे को न जाननेवाले ज्ञानों के अनुसन्धान से उत्पन्न होनेवाला
लोक-व्यवहार विनष्ट हो जायेगा ॥ ६ ॥
'जनस्य' लोगों का बाहर और भीतर की जो 'स्थितिः' व्यवहार वह सब ज्ञानों का
'अनुसन्धान' जो अनुसन्धान करना है वह एकविषयकभाव की स्मृति प्राप्त करना ही है,
क्योंकि वह उसी के आधीन रहती है । जैसे कि स्मरणमूलक ही सब व्यवहार होते हैं । प्रथम
अनुभव काल में भी प्रत्यक्ष ज्ञान होता है कि 'मैं यह जानता हूँ' इस तरह स्मरण से अनुप्राणित
पूर्वोत्तररूप अनुसन्धान के बिना नहीं घटता, क्योंकि प्रमाता में उसका विश्राम नहीं होगा ।
साथ ही अप्रत्यक्ष का प्रसङ्ग उपस्थित हो जायेगा । इसी प्रकार सुख-दुःखादि में भी समझना
चाहिए । छोड़ना, ग्रहण करना, प्रेरणा करना और स्वीकार करना रूप जितने भी व्यवहार हैं वे
सभी स्मरणजन्य ही होते हैं । 'एवं ज्ञानानां' इस प्रकार ज्ञानों का जो अनुसन्धान है उससे होने-
वाला 'जनस्थितिः' लोक-व्यवहार 'एवं' ऐसा बौद्ध सिद्धान्त के स्वीकार करने पर 'नश्येत्'
विनष्ट हो जायेगा यह सम्भव है ।
अ.-१, आ.-३, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ५९
चेत्, विशेषणद्वारेण हेतुमाह 'अन्योन्यं' तावत् 'भिन्नानि' ज्ञानानि-अन्यत् अनुभवज्ञानं, अन्यत्
इदानीन्तनं ज्ञानं विकल्पाभिमतं, अन्यत् स्मरणसंमतं ज्ञानं । तत् एतानि स्वविषयप्रकाशमात्र-
रूपाणि परविषये जडान्धानेडमूककल्पानि, नच अन्योन्यस्य प्रकाशरूपाणि । एवं न स्वरूपतो न
वेद्यतो वा एकीभावरूपम् अनुसंधानम् अस्ति । अन्योन्यं च विषयविषयिभावो नास्ति । नै२च तुर्यं
ज्ञातेयनिबन्धनम् अनुसंधानाद्यापि संभाव्यते,–इति ध्वंसेरन् व्यवहाराः । न च ध्वंसन्तामिति
भवदभीष्टापमात्रान् ते ध्वंसन्ते प्रकाशन्ते यतः तत एतत् आपद्यते, एतदेव समर्थयितुम्
उद्यन्तव्यम्-इति ॥ ६ ॥
तच्च अस्मदभिमतप्रकारेण विना विधेरपि अशक्यसमर्थनम्-इति दर्शयति-
न चेदन्तःकृतानन्तविश्वरूपो महेश्वरः ।
स्यादेकश्चिद्वपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान् ॥ ७ ॥
'संवित् तावत् प्रकाशते' इति तावत् न केचित् अपह्नुवते । सा तु संवित् यदि स्वात्म-
दूसरे को यथार्थ बोध हो जाये इसलिए पञ्चावयववाक्य का उत्थापन किया जाता है
'कुतः' अर्थात् किससे ? यदि ऐसा कहते हो, तो विशेषण के द्वारा हेतु को दिखाते हैं-'अन्योन्यं'
परस्पर 'भिन्नानि' भिन्न-भिन्न ज्ञान एक प्रमाता में विश्रान्त होनेवाले ज्ञान के बिना जो
दूसरा शुद्ध अनुभवात्मक ज्ञान है, दूसरा इस समय का ज्ञान जो विकल्प से युक्त होता है, 'अन्यत्'
शब्द का दूसरा अर्थ यह है कि स्मरणजन्य ज्ञान । इसी कारण वे सभी ज्ञान अपने विषय का प्रकाश
मात्र करते हैं दूसरे के विषय में तो जड अन्धे और बहरे के समान हो जाते हैं और एक दूसरे का
प्रकाश नहीं कर सकते हैं। इसीलिए न स्वरूपतः स्मृति अनुभव को विषय कर सकती है और
न तो अनुभूत को वेद्यरूप से विषय करती है। वेद्य और स्वरूप से भी एकीभावरूप होकर
अनुसन्धान नहीं हो सकता है और परस्पर विषय-विषयीभाव भी नहीं हो सकता है । चौथा
परस्पर भिन्नों का एक में ज्ञातेयरूप अनुसन्धान भी नहीं हो सकता, क्योंकि उनका होना सम्भव
नहीं है इसलिए जगत् के सारे व्यवहार नष्ट हो जायेंगे और 'ध्वंसन्ताम्' ध्वस्त हो जायें ऐसा
आपके कहने मात्र से तो न ध्वंस ही हो सकेंगे और न प्रकाशित ही हो सकेंगे, क्योंकि जिससे यह
होता है उसीसे उदय भी होता है ॥ ६ ॥
इसीलिए हमारी अभीष्ट इच्छा के बिना विधाता का भी समर्थन अशक्य ही है-इसको
दिखाया जाता है-जिसने अनन्त विश्व अपने भीतर कर लिया है, जो ज्ञान, स्मृति और अपोहन
शक्तिरूप तथा चेतन शरीरवाला है ऐसा महेश्वर यदि नहीं होता तो (जनस्थिति नष्ट हो
जाती ) ॥ ६ ॥
'संवित् तावत् प्रकाशते' पहले जब तक संवित्-ज्ञान प्रकाशित रहता है तब तक कोई ज्ञान
१. स्मृति न तो अनुभव को विषय करती है, न वेद्य से अनुभूत विषय को विषय करती है ।
२. चकार शब्द अत्यन्त असम्भावना अर्थ में दिया है ।
६०/] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-७
मात्रविश्रान्ता अर्थस्य सा कथं प्रकाशः ?, स हि अर्थधर्म एव तथा स्यात्; ततश्च अर्थप्रकाशः
तावत्येव पर्यवसितः,--इति गलितो ग्राह्यग्राहकभावः। अतोऽर्थप्रकाशरूपां संविदम् इच्छता
बलादेव अर्थोऽपि तद्रूपान्तर्गत एव अङ्गीकर्तव्यः; स च अर्थप्रकाशो यदि अन्यश्च अन्यश्च, तत्
न स्मरणम् उपपन्नम्,--इति अत एक एव असौ,--इति एकत्वात् सर्वो वेद्यराशिः तेन
क्रोडीकृतः,--इत्येतदपि अनिच्छता अङ्गीकार्यम्। एवमपि सततमेव उन्मग्ने निमग्ने वा
विश्वात्मना प्रकाशेत, तथास्वभावत्वात्। न चैवम्, अतः स्वरूपान्तर्बुडितम् अर्थराशिम् अपरमपि
भिन्नाकारम् आत्मनि परिगृह्य, कांचिदेव अर्थं स्वरूपात् उन्मग्नम् आभासयति,-इति आपतितम्।
सैषा ज्ञानशक्तिः। उन्मग्नाभाससंभिन्नं च चित्स्वरूपं बहिर्मुखत्वात् तच्छायानुरागात् नवं नवं
ज्ञानमुक्तम्। एवमपि नवनवाभासाः प्रतिक्षणम् उदयव्ययभाजः,--इति सैव व्यवहारनिवह-
हानिः। तेन क्वचित् आभासे गृहीतपूर्वे यत् संवेदनं बहिर्मुखम् अभूत्, तस्य यत् अन्तर्मुखं
चित्स्वरूपत्वं तत् कालान्तरेऽपि अवस्थासु स्वात्मगतं तद्विषयविशेषे बहिर्मुखत्वं परामृशति,—
इति एषा स्मृतिशक्तिः। यच्च तत् नवं भासयति स्मरति वा तत् वस्तुतः संविदा विश्वमय्या
तादात्म्यवृत्ति,--इति विश्वमयं पूर्णमेव,--इति नवं न किंचित् आभासितं स्मृतं वा स्यात् ।
छिपा नहीं रहता है। यदि वह संवित् = ज्ञान अपने स्वरूप मात्र में विश्रान्त होता हो तो फिर
वह अर्थविषय को प्रकाशित कैसे करेगा ?
पदार्थधर्म ही उसी प्रकार होता हो तो, पदार्थों का प्रकाश उतने में ही लीन रहता।
इससे फिर जितने भी ग्राह्य-ग्राहक भाव हैं, वे सब समाप्त हो जाते हैं। इसीलिए अर्थविषयक
प्रकाश करनेवाली संवित् को माननेवाले बौद्ध को हठात् अर्थ का प्रकाश भी उसी (संवित्) के
अन्तर्गत मानना पड़ेगा और यदि वह अर्थ प्रकाश कोई दूसरा है और वह उससे भी भिन्न है
तब तो फिर स्मरण नहीं बनेगा, इसलिए एक ही यह है, भिन्न नहीं है। एक होने के कारण सब
वेद्य-राशि को अपने भीतर सम्मिलित कर लिया, इस प्रकार नहीं चाहते हुए भी मानना पड़ेगा।
इसी तरह सर्वदा उन्मग्न और निमग्न होनेवाला विश्वरूपसे प्रकाशित होगा; क्योंकि उसी प्रकार
का अपना उसका स्वभाव है और ऐसा नहीं देखा जाता है, इसीलिए अपने स्वरूप से अर्थराशि
उसी में डूबी रहती है और दूसरे भी विभिन्न आकारवाले को अपने में सम्मिलित करके स्वरूप से
अलग कुछ ही पदार्थ भासित करता है—यही कहना पड़ेगा। वही यह ज्ञान-शक्ति है और शरीरादि
से अवच्छिन्न संकुचित प्रकाशरूप बहिर्मुख होने के कारण उसकी छाया के सम्पर्क से नया-नया
ज्ञान प्रकाशित होता है—ऐसा कहा गया है। इस तरह ज्ञान-शक्तिके समर्थन करने में नये-नये
बहिर्मुखी आभास प्रतिक्षण उदय एवं अस्त होते रहेंगे, वही व्यवहारसमूह का लोप कहा
जायेगा। इसलिए कहीं आभास पहले गृहीत होने पर जो ज्ञान बहिर्मुख हुआ था, उसका जो
अन्तर्मुख चेतनस्वरूपज्ञान है वह कालान्तर में एवं दूसरी अवस्था में भी अपने विषय विशेष में
बहिर्मुखता का परामर्श करता है—इसी का नाम स्मृति-शक्ति है। नया रूप भासित करती है या
स्मरण करती है। वस्तुतः वह विश्वमय संवित् से तादात्म्यवृत्ति प्राप्त कर रहती है, इसलिए
१. शरीरादि में माया प्रमाता अवच्छिन्न संकुचित स्वभाववाला होकर अपनी अपेक्षा से भिन्न-भिन्न पदार्थों
को प्रकाशित करते हैं उसका बहिर्मुखी ज्ञान नया-नया कहा जाता है और उसमें जो ऐश्वर्य, स्वातन्त्र्य
है वही ज्ञान-शक्ति है।
अ.-१, आ.-३, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेतम् [ ६१
इदमपि प्रवाहपतितम् ऊरीकार्यम्—यत् किल तत् आभास्यते तत् संविदो विच्छिद्यते,
संविच्च ततः, संविच्च संविदान्तरात्, संवेद्यं च संवेद्यान्तरात्; नच विच्छेदनं वस्तुतः संभवति,—
इति विच्छेदनस्य अवभासमात्रम् उच्यते । नच तत् इयता अपारमार्थिकम्, निर्मीयमाणस्य सर्वस्य
अयमेव परमार्थो यतः । एष एव परितश्छेदनात् परिच्छेद उच्यते, तदवभासनसामर्थ्यम् अपोहन-
शक्तिः । अनेन शक्तित्रयेण विश्वे व्यवहाराः । तच्च भगवत एव शक्तित्रयं—यत् तथाभूतानुभवितृ-
स्मर्तृ-विकल्पयितृस्वभावचैत्रमैत्राद्यवभासनम् । स एव हि तेन तेन वपुषा जानाति, स्मरति
विकल्पयति च । यथोक्तम् आचार्येणैव 'यद्यप्यर्थस्थितिः प्राणपुर्यष्टकनियन्त्रिते। जीवे निरुद्धा
विश्व उससे परिपूर्ण हो जाता है, इससे कोई नयी-वस्तु आभासित या स्मृत नहीं होती है ।
यह जो आगे कहेंगे सबको स्वीकार करना होगा—वह आभासित होता है वह संवित् ज्ञान
भिन्न है और संवित् ज्ञान भी उससे भिन्न होता है और संवित् ज्ञान अन्य संवित् ज्ञान से भिन्न
होता है तथा संवेद्य भी दूसरे संवेद्य से भिन्न होता है; इसी से वहाँ विच्छेदन का आभासमात्र
कहा जाता है और विच्छेदन इसी कारण अपारमार्थिक नहीं है; क्योंकि सब निर्मीयमाण पदार्थ
परमार्थतः सत्य ही होते हैं। वह परिच्छिन्न होने के कारण ‘परिच्छिन्न'—संकुचित कहा जाता
है—उसका ठीक-ठीक आभासित नहीं होना, अपोहन-शक्ति कही जाती है। भगवान् के जिस
मायारूप स्वातन्त्र्य-शक्ति से मायीय जीव प्रमाता का विकल्परूप ज्ञान होता है वही अपोहन-
शक्ति है। इन्हीं तीनों शक्तियों से सारे विश्व का व्यवहार-विचार आदि कार्य होते रहते हैं।
ये तीनों शक्तियाँ भगवान् महेश्वर की ही हैं—जो कि स्वभाव से ही अनुभव करनेवाले, स्मरण
करनेवाले और विकल्प करनेवाले चैत्र-मैत्र आदि का अवभासन करते हैं। वे ही उस-उस शरीर
से जानते हैं, स्मरण करते हैं और विकल्प करते हैं। जैसे कि आचार्य ने कहा है—'यद्यपि
१. देश, कालादि विशेष अवच्छेद से शून्य होने के कारण विचित्र इच्छा से अवबोधित, केवल आभास
भेदसंस्कार के द्वारा उत्पन्न हुए विकल्परूप विज्ञानवाली अपोहन-शक्ति कहलाती है, पूर्व अवभासित
वस्तु का, पूर्व में अवभासित हुए पदार्थ के साथ वर्तमान समय में प्रकाश होना ही प्रख्यापन-शक्ति है,
अपोहन-शक्ति और स्मृति-शक्ति इन दोनों में यही भेद है ।
२. भगवान् की जिस स्वातन्त्र्य-शक्ति के द्वारा मायीय प्रमाता का विकल्परूप हो जाता है वही अपोहन-
शक्ति है ।
३. न वह्नेर्दाहिका शक्तिर्व्यतिरिक्ता विभाव्यते ।
केवलं ज्ञानसत्तायाः प्रारम्भोऽयं प्रवेशने ॥
“वह्नि में रहनेवाली जो वह्नि की दाहिका शक्ति है वह वह्नि से भिन्न देश-काल में नहीं रहती
अपितु उसी में रहती है। यह केवल ज्ञान सत्तामें प्रवेश करने केलिए ही प्रारम्भ होता है ।” इस
आगम के कथन से अग्नि दाहक, पाचक, प्रकाशक इत्यादि अनेक परामर्शों की प्रधानता में शक्ति का
व्यवहार देखा जाता है। वह्नि में परामर्शोन की प्रधानता होने के कारण लोक में वह्नि का ही
व्यवहार होता है ।
६२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-७
तत्रापि परमात्मनि सा स्थिता ।।' इत्यादि । एतासां च ज्ञानादिशक्तीनाम् असंख्यप्रकारो
वैचित्र्यविकल्पः, — इति तत्सामर्थ्यं स्वातन्त्र्यम्, अपराधीनं पूर्णं महदैश्वर्यं तन्निमित्तब्रह्म-
विष्णुरुद्राद्यैश्वर्यापेक्षया उच्यते । तदेव 'चिद्वपुः' इत्येवं कृत्वा इयदायातम् 'विश्वरूपः' इति ।
तत एव च परिनिष्ठितैकरूपजडभाववैलक्षण्यात् ज्ञानादिशक्तियुक्ततामाहेश्वर्यम् उपसंप्राप्तः ।
एतदनुपगमे न किंचित् इदं भासेत, — इति प्रसङ्गः । भासते तु; तस्मात् एतत् अवश्यम्
अङ्गीकर्तव्यम्, — इति प्रसङ्गविपर्ययः । नश्येज्जनस्थितिः, यद्येवं न स्यात्, — इति प्राक्तनेन
श्लोकेन सह प्रसङ्गः 'चेत्' इत्यनेन तद्विपर्ययः सूचितः ॥ ७ ॥ आदितः ॥ २३ ॥
इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायां ईश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां
ज्ञानाधिकारे परदर्शनानुपपत्तिर्नाम तृतीयमाह्निकम् ॥ ३॥
प्राण और पुर्यष्टक से बद्ध जीव में अर्थस्थिति नियन्त्रित रहती है तथापि वह परमात्मा में रहती है
जीव में नहीं रहती ।'
इन ज्ञानादिशक्तियों के असंख्य प्रकार से विचित्र विकल्प होते हैं, उसी के सामर्थ्य से स्वा-
तन्त्र-शक्ति रहती है अर्थात् उसी का नाम सामर्थ्य एवं स्वातन्त्र्य है । ईश्वर का स्वातन्त्र्य पराधीन
न होकर स्वाधीन रहता है और पूर्ण एवं महा ऐश्वर्य से संयुक्त है, क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु एवं
अन्य देवों में जो सामर्थ्य है उससे वह बढ़ा-चढ़ा रहता है अर्थात् इसके सामर्थ्य से ही ये सभी
देवता आदि सामर्थ्यशाली होते हैं । वही 'चिद्वपुः' चेतन शरीरधारी ईश्वर है इतने निबन्ध से इनका
विश्वरूपत्व सिद्ध होता है । इसी से परिनिष्ठित एक रूप में रहते हैं जड से विलक्षण इनका स्वरूप
है तथा ज्ञानादि शक्तियों से युक्त होकर महा ऐश्वर्य को प्राप्त किये रहते हैं । इनको न मानने पर
कुछ भी भासित नहीं होगा, ऐसा प्रसंग आ पड़ेगा । किन्तु भासित ही होता है; इसलिए इसे
अवश्य स्वीकार करना चाहिए, यही प्रसंग का विपर्यय व्यतिरेक है। यदि ऐसा न हो तो लोक-
व्यवहार विनष्ट हो जायेगा, पहले श्लोक के साथ प्रसंग लगाकर 'चेत्' इससे विपरीत प्रसंग
विपर्यय कहा है यह सूचित हुआ ॥ १७ ॥
॥ तृतीय आह्निक समाप्त ॥
१. न सा जीवकला काचित्संतानद्वयवर्तिनी ।
व्याप्त्री शिवकला यस्यामधिष्ठात्री न विद्यते ॥
दो सन्तानों से व्यवहृत होनेवाली [ ज्ञान सन्तान और क्रिया सन्तान ] कोई भी जीवकला
ऐसी नहीं दिखती है कि जिसमें शिवकला अधिष्ठात्री होकर व्याप्त न रहती हो ।
अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे स्मृतिशक्तिनिरूपणाख्यं
चतुर्थमाह्निकम्
पदार्थरत्ननिकरं निजहृद्गञ्जपुञ्जितम् ।
ग्रन्थन्तं स्मृतिसूत्रान्तः संतत्यैव स्तुमः शिवम् ॥१॥
एवं ज्ञानपूर्विका स्मृतिः, तदुभयानुग्राहिणी अपोहनशक्तिः, —इति तावात् वस्तुसंभवक्रमेण
प्रदर्शितम् । उपक्रमानुसारेण स्मृतिरेव सूचितप्रसङ्गविपर्ययसमर्थनदृशा विवेच्या । 'सत्यं किंतु
स्मृतिज्ञानम्..............।'
इति हि उपक्रान्तम् । तत्र संस्कारमात्रात् तावत् मा नाम उदपादि स्मृतिः, इदं तु वक्तव्यम्—
तथाभूतभवदभ्युपगतभगवत्प्रभावोऽपि कथम् एनां कुर्यात् ?,—इति शङ्कां शमयितुं स्मृतितत्त्व-
निरूपणाय 'स हि पूर्वानुभूतार्थोपलब्धा.........।' इत्यादि'............'अर्थो भातः प्रमातरि ।'
इत्यन्तं श्लोकाष्टकम् । तत्र श्लोकेन स्वपक्षे स्मृतिरुपपन्ना,-इति कथितम् । द्वितीयेन स्मृतेः पूर्वानु-
पदार्थरूपी रत्नसमूह [ सभी पदार्थसमूह को आभासित करनेवाले चिदानन्तसार ] को
अपने हृदयरूपी स्थान [ आकर ] में एकत्रित किया गया है । स्मृतिरूपी सूत्र के भीतर क्रम से
गूँथनेवाले उस शिव की हम स्तुति करते हैं ॥ १ ॥
इस प्रकार ज्ञानपूर्वक स्मृति होती है, ज्ञान और स्मृति को अन्तर में जगानेवाली
अपोहन-शक्ति है, पहले किसी प्रकार वस्तु सम्भव हो सके उसे क्रमशः दिखलाया है । प्रारम्भ में
जैसा कहा गया है उसके अनुसार स्मृति को ही सूचित किये गये प्रसङ्ग के विपरीत समर्थन की
दृष्टि से विचार करना होगा ।
'सत्यं किंतु स्मृतिज्ञानम्............ । [ पूर्वपक्ष में 'अथानुभवविध्वंसे स्मृतिः' तथा
सिद्धान्तपक्ष में भी 'सत्यं किंतु' ठीक ही है 'न चेत्' इससे आत्म ईश्वर-सिद्धि में सातिशय
अभिज्ञान माना है । गीता में भी भगवान् ने कहा है कि—'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च' पहले
देखी-सुनी या किसी प्रकार भी अनुभव की हुई वस्तु या घटनादि के स्मरण का नाम 'स्मृति'
है । किसी भी वस्तु को यथार्थ जान लेने की शक्ति का नाम 'ज्ञान' है—तथा संशय-विपर्यय
आदि वितर्क जाल का वाचक 'ऊहन' है और उससे दूर होने का नाम 'अपोहन' है । ये तीनों
मुझसे ही होते हैं । ] क्योंकि ऐसा ही प्रारम्भ में कहा गया है । उस जगह भले ही संस्कारमात्र
से स्मृति उत्पन्न होती हो, किन्तु यह तो कहना ही पड़ेगा कि—आपके कल्पना किये हुए भगवान्
का प्रभाव इसको तैयार कर खड़ा कैसे करेगा ? [ प्रभाव उसी वस्तु-पदार्थ को कहा जाता है
जो असम्भव को भी सम्भव कर सकने में समर्थ हो । ]
इस शङ्का के शमनार्थ स्मृतितत्त्व का निरूपण करने के लिए 'स हि पूर्वानुभूतार्थो-
पलब्धा......।' यहाँ से लेकर'.....'अर्थो भातः प्रमातरि ।' पर्यन्त आठ श्लोक कहे गये हैं ।
प्रथम श्लोक से अपने सिद्धान्त पक्ष में स्मृति उत्पन्न होती है, यह कहा गया है । द्वितीय श्लोक से
६४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-१
भवविषयीकृतस्वलक्षणप्रकाशनसामर्थ्यमुक्तम् । तृतीयेन अनुभवेन तद्विषयेण च एकीभाव पर्यन्त
आवेशः स्मरणस्य उक्तः। तुरीयेण अनुभवस्य न विषयतया स्मृत्या प्रकाशनम्, —इति
निरूपितम् । पञ्चमेन योगिज्ञानमपि अनुभवं पृथग्भावेन न विषयीकरोति, —इति वदता
तुर्यश्लोकार्थ एव उपोद्वलितः । षष्ठेनाशङ्क्यमानम् अनुभवस्य स्मृत्या पृथग्विषयीकरणं
काल्पनिकम्,—इत्यवास्तविकृतम् । सप्तमेन स्मृतिप्रसङ्गात् विकल्पेऽपि पूर्वानुभवेन ऐक्यात्मावेशो
दर्शितः अष्टमेन स्मर्त्तव्यस्य, स्मृतेः स्मर्तुश्च एकचित्तत्त्वविश्रान्तिः उक्ता; प्रसङ्गाच्च दृश्यस्य,
दर्शनस्य द्रष्टुश्च,—इति तात्पर्यार्थः । अथ क्रमेण श्लोकार्थ उच्यते ।
स हि पूर्वानुभूतार्थोपलब्धा परतोऽपि सन् ।
विमृशन्स इति स्वैरी स्मरतीत्यपदिश्यते ॥ १ ॥
'पूर्वमनुभूतस्य अर्थस्य' य 'उपलब्धा' अन्तर्मुखो बोधः स तावत् अद्यापि 'परतः' स्मृति-
पूर्व के अनुभव से विषय किया हुआ स्वलक्षण प्रकाशन-सामर्थ्य कहा है। तृतीय श्लोक से अनुभव
और उसके विषय से स्मरण का एक में जबतक मिल नहीं जाता है यह बताया है। चतुर्थ
श्लोक से अनुभव विषयरूप से स्मृति द्वारा अलग नहीं भासता है ऐसा निरूपण हुआ है।
पञ्चम श्लोक से योगिजन का ज्ञान भी अनुभव को भिन्नरूप से विषय नहीं करता है, इसको
आचार्य ने चतुर्थ श्लोक के अर्थ में ही दृढ कर दिया है। षष्ठ श्लोक से शङ्का किये हुए अनुभव
का स्मृति से 'इदन्तया' भेदयुक्त ज्ञान कल्पना का विषयमात्र है, जब कि वह वास्तविक नहीं है।
सप्तम श्लोक से स्मृति के प्रसङ्ग से विकल्प ज्ञान में भी अनुभव के द्वारा एकता में मिल जाना
यह दिखलाया है। अष्टम श्लोक से स्मर्त्तव्य विषय का, स्मृतिज्ञान और स्मरण करनेवाला स्मर्ता
पारमार्थिक एक चित्तत्त्व महाप्रकाश की प्रमाता में विश्रान्ति होना बताया है; और प्रसङ्ग से
दृश्य का, दर्शन का और द्रष्टा का, इतना ही इसका तात्पर्यार्थ है। इसके पश्चात् अब क्रम से
श्लोकार्थ कहा जाता है।
वही पूर्व के अनुभूत अर्थ को प्राप्त करनेवाला पूर्वानुभवकाल से अन्य स्मरण काल में
कारण विद्यमान रहता है। वह स्वतन्त्ररूप बोधात्मा विचार करता हुआ स्मरण करता है—ऐसा
उपदेश दिया जाता है ॥ १ ॥
'पूर्वमनुभूतस्य अर्थस्य' जिसने पूर्व अनुभूत अर्थ का अन्तर्मुख बोध प्राप्त किया था, वह
वर्तमान समय में भी रहता ही है, संविद्रूपमात्रस्वरूप का काल से किये हुए संकोचरूप विशेषात्मक
रूप से विच्छेद का सम्बन्ध नहीं हो सकता । जिस स्थितिमें है उसीमें वह रहेगा, [ क्योंकि उससे
अभिन्न एक रूप होने के कारण पूर्व की अनुभूत वस्तु की स्थिति सम्भव नहीं होगी। इससे फिर
स्मरण कैसे बनेगा। स्मृति का सर्व आकारवाला स्वातन्त्र्य होता है ऐसा दिवाकर भट्ट ने
कहा है—
सर्वेऽनुभूता यदि नान्तरर्थास्त्वदात्मसात्कारसुरक्षिताः स्युः ।
विज्ञातवस्त्वप्रतिमोषरूपा काचित्स्मृतिर्नाम न सम्भवेत्तत् ॥
“यदि अन्तर्वर्ती अनुभूत अर्थ तुम्हारी आत्मा में सुरक्षित नहीं रहेगा, विज्ञात वस्तु के
असदृशरूप होने से कुछ भी स्मृति सम्भव नहीं होगी।”]
अ.-१, आ.-४, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ६५
कालेऽपि अस्त्येव, संविन्मात्रस्वरूपस्य कालकृतसङ्कोचरूपविशेषात्मकविच्छेदायोगात् । अनुभवस्य
च अन्तः अर्थोऽपि अपृथग्भावेन अवस्थितः—इत्येतदपि अयत्नसिद्धम् । इदं तु चिन्त्यम्—अकाल-
कलिते संवेदने तदन्तर्वर्तिनि च विश्वत्र भावजाते यदि तावत् चिन्मयतापरामर्शः, तत् 'अहम्'
इति एतावतैव पूर्णेन विमर्शेन भाव्यम्; अथ इदन्तया पृथग्भावावभासनेन, तथापि तत्र द्वयी
गतिः । 'अहम्' इत्यंशे यदि विश्राम्यति इदन्ता, तदा 'अहमिदम्' इति सदाशिवदशया भाव्यम्;
अथ न रोहति, तत् 'इदम्' इत्येव आभासनेन भवितव्यम्; अपूर्वताभासनाच्च तत् अनुभवनमेव
स्यात् न स्मरणम्,— इत्याशङ्क्याह 'स्वैरी' इति । 'स्वम्' आत्मीयम् उपकरणम् ईरयति कर्तव्येषु
अवश्यं तच्छीलश्च; 'स्वं'१ च आत्मानम् ईरयति न पुनः स्वकर्तव्ये प्रेरकमपेक्षते,—इति 'स्वैरी'
स्वतन्त्रः । तेन स्वतन्त्रत्वात् 'स' इत्येवं विमृशति । स इति विमर्शनस्य च इयद्रूपम्—यत्
सर्वथा अकालकलितस्वरूपपरामर्शनमेव न, नापि अत्यन्तभेदपरामर्शनमेव; अपि तु यो भावः
पूर्वमनुभवकाले तद्देशकालप्रमात्रन्तरसाचिव्येन पृथक्कृतो न च अहन्तायामेव विलीनीकृतः,
स तादृगेव तमसेव आच्छाद्य अवस्थापितः संस्कारशब्दवाच्यः, तस्य तमाच्छादकम् अपहस्तयति;
तत्र अपहस्तिते स पूर्ववत् पृथक्कृत इवावभाति । ननु च इदन्तया अवभासेत पूर्ववदेव, नैवम्
अर्थ भी अनुभव के भीतर अभिन्न एकरूपसे रहता है, यह बात तो अयत्न ही सिद्ध
है किन्तु यह विचारणीय है कि—'अकालकलित्' काल-विच्छेद-शून्य संवेदन ज्ञान में और उसके
अन्तर्वर्त्ती विश्व के समस्त भावपदार्थों में यदि चिन्मयपरामर्श होता हो तब तो 'अहम्' इतने से
ही पूर्ण विमर्श हो जाना चाहिए; बाद में इदन्ता भिन्नरूप से अवभासमान होती है, फिर भी
उस समय में 'अहमिदम्' सदाशिव-ईश्वर दो 'गति स्थिति' रहती है। 'अहम्' इस भाग में यदि
इदन्ता की विश्रान्ति होती हो, तो 'अहमिदम्' सदाशिवस्थिति होगी, इदन्ता नहीं विश्रामित
होती हो तो 'इदम्' यही आभासरूप होना चाहिए; और अपूर्वरूप से आभासन होने से तो
अनुभवन ही होगा, स्मरण फिर नहीं हो सकेगा, इस पर आशंका कर कहते हैं कि—'स्वैरी'
परमेश्वर के स्वातन्त्र्य पद को ही स्वैरी पद से द्योतित किया है। 'स्वम्' अपनी सामग्री को
अवश्य कर्त्तव्यों में लगाता है और लगाने के स्वभाववाला भी है तथा 'स्वम्' अपने आपको ही
उन्हीं में लगाता है, किसी अन्य प्रेरक की अपेक्षा नहीं रखता अर्थात् किसी दूसरे के मुख की
ओर देखना नहीं पड़ता, सर्वतन्त्र स्वतन्त्र रहता है, इसलिए 'स्वैरी' वह स्वतन्त्र है । स्वतन्त्ररूप
होने से 'स' वह विमर्शन करता है। 'स' [ उससे भी क्या ? ] विमर्शन का इतना मात्र ही रूप है।
नहीं, ऐसी बात नहीं है। जिसका सर्वथा काल से असंकुचित परामर्शरूप ही 'अहम्' स्वरूप है,
और उनमें न तो इदन्तरूप से अत्यन्त भेद परामर्शन ही है; अपितु जो भाव पूर्व अनुभव काल
में था वह देश, काल अन्य प्रमाता के साथ होने से अलग किया हुआ है अहन्ता में ही
विलीन नहीं किया हुआ है, वह उसी प्रकार ही अज्ञानतम से आच्छादित (ढक) कर रखा गया
संस्कार शब्द से कहा गया है, उसका अज्ञानतम आच्छादन करनेवाला है वही उसे छिपा देता
है, उसमें छिप जाने पर वह पूर्व के जैसा पृथक् किये हुए की भाँति ही भासता है।
१. स्व शब्द आत्मा एवं आत्मीय का वाची है; गणपाठ वृत्ति के अनुसार ।
२. 'तत्' पद से अनुभव लिया गया है,
९
६६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-१
तदानीन्तनावभासनपृथक्कृतशरीरादिसंबन्धमनवधूयैव हि तत्प्रकाशः; ततश्च इदानीन्तनावभासन-
कालपरामर्शोऽपि न निमीलति, —इति एतत्परामर्श भित्तिप्राधान्येन पूर्वकालपरामर्शः, —इति
विरुद्धपूर्वापरपरामर्शस्वभाव एव 'स' इति परामर्श उच्यते। एवं च स एव परमेश्वरः 'स्मरति' ।
एतदेव हि तस्य स्मरणम्—यत् एवंप्रकारपरामर्शोचितकालकलादिस्पर्शसहिष्णुमायाप्रमातृभाव-
परिग्रहः,—इति मायाविद्याद्वयाद्वैधमयम् । तत एव सकलसिद्धिवितरणचतुरचिन्तामणिप्रख्यम्
आगमिकाः स्मरणमेव मन्त्रादिप्रमाणित मन्यन्ते । तथा च—
'ध्यानादिभावं स्मृतिरेव लब्ध्वा चिन्तामणिस्त्वद्विभवं व्यनक्ति।'
इति। अलं तावत् अनेन । तृन्नन्तसमासेन यत्नतोऽनुभवस्यार्थमुखेन कालस्पर्शम्, अर्थविश्रान्ततां,
द्वयोरपि प्रमातरि निरूढिं भेदाभेदाभ्यां दर्शयति, वृत्तौ एकार्थीभावात् तस्य च भेदाभेदमयत्वम्—
इति वक्ष्यामः ॥ १ ॥
अब शङ्का करते हैं कि इदन्ता रूप से पूर्व में जैसा अलग से भासित होता था वैसा ही
अलग किया हुआ जो शरीरादि अभी भी भासित होगा, ऐसी बात नहीं है । उस अनुभव काल
में अवभासन से अलग किया हुआ शारीरादि सम्बन्ध उसे न हटाता हुआ ही उस स्मर्यमाण
का प्रकाश रहता ही है और इससे इस समय में होनेवाला अवभासन काल का परामर्श भी नष्ट
नहीं होता है, इस स्मरणकालिक परामर्श को आधार मानकर पूर्वकाल का भी परामर्श रहता
है, इसी को पूर्वोत्तर विरुद्ध स्वभाव वाला परामर्श कहा जाता है और इस प्रकार वही परमेश्वर
'स्मरति' स्मरण करता है। यही उसका स्मरण है एवं पूर्वोत्तर विरुद्ध स्वभाववाला परामर्श के
समुचित काल-कलादि को सहनेवाला माया प्रमाता का भावपरिग्रह ग्रहण करना कहलाता है।
जो माया—'भेदप्रथा' और विद्या—'शुद्धविद्या' है यही दोनों का ऐक्यभाव है। इससे ही सकल
सिद्धि देनेवाली चतुर चिन्तामणि के तुल्य आगमिक लोग [ शुद्ध विद्या परामर्श प्राणित ] मन्त्रादि
जीवित स्मरण मानते हैं और वैसा कहा भी है—
'स्मृति ध्यानादिभाव को उपलब्ध करानेवाली है। स्वातन्त्र्य के ऐश्वर्य विभव को
स्मरणात्मिका चिन्तामणि व्यक्त करती है।'
इस विषय में इतना ही कहना पर्याप्त है। [ पूर्वानुभूतोपलब्धा इसमें 'न लोकाव्यय-
निष्ठाखलर्थतृनाम्' इस पाणिनीय सूत्र से षष्ठी समास का निषेध कर 'द्वितीयाश्रितातीतेति' इस सूत्र
में द्वितीया पद का योगविभागादि करके अनायास तृन्नन्त समास कर लिया जाता है ] यत्न पूर्वक
तृन्नन्त समास के द्वारा अनुभव का अर्थ प्रधानतया काल से सम्बन्ध रखता है, अर्थ में विश्रान्ति
होती है, अर्थात् अनुभव और अर्थ इन दोनों का ही प्रमाता में बैठ जाना भेद एवं अभेद द्वारा
दिखाता है, समास में एकार्थीभाव हो जाने के कारण उसका भेद और अभेदमयत्व हो जाता है—
इस विषय में हम कहेंगे ॥ १ ॥
१. माया = भेद प्रथा, माया, कला, विद्या, राग, नियति, काल ये छः तत्त्वसमुदाय भेद प्रथा को बढ़ानेवाले
हैं इसका दूसरा नाम शास्त्रीय भाषा में 'षट् कंचुक' भी कहा जाता है। विद्या = शुद्ध विद्या, इसका
छत्तीस तत्त्वों के मध्य में पञ्चम स्थान है। इस विद्यातत्त्व में इदं च एवं अहं च ये दोनों समान रूप
से दृष्टि गोचर होते हैं। यद्यपि इसमें अनेकत्व का अनुभव होता है फिर भी एकत्वभाव रहता है।
इसमें आरूढ होनेवाले साधक को मन्त्र शब्द से कहा जाता है।
अ.-१, आ.-४, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ६७
एतदेव स्मृतितत्त्वमुपपादयितुं श्लोकान्तराणि । तत्र यदि कश्चिद्ब्रूयात्—इह स्मृतिर्विकल्पः,
न च अनेनार्थः प्रकाश्यते, अर्थासंस्पर्शिनो हि विकल्पाः, अनुभवेन च येन सोऽर्थः प्रकाशतां नीतः
स इदानीं कीर्तिमात्रमूर्तिर्जातः, न च सोऽपि स्मृत्या प्रकाश्यते—ज्ञानस्य ज्ञानान्तरेणासंवेद्यत्वात्
असत्त्वाच्च—इति अर्थस्य प्रकाशनाभावात् ‘इदं स्मरामि’ इति ज्ञानं भ्रान्तिमात्रमेव—इति
पुनरपि आपतितम्—इति, तदा तं प्रति उच्यते—
भासयेच्च स्वकालेऽर्थात्पूर्वाभासितमामृशन् ।
स्वलक्षणं घटाभासमात्रेणाथाखिलात्मना ॥ २ ॥
इसी स्मृतितत्त्व के उपपादनार्थं दूसरे श्लोक भी हैं । उस पर यदि कोई बोले कि—स्मृति
विकल्प है, इस विकल्प से अर्थ प्रकाशित नहीं होता, क्योंकि वस्तु का संस्पर्श न करने वाला ही
विकल्प कहलाता है । जिस अनुभव से उस अर्थ का प्रकाशन होता है वह उस समय में केवल
कीर्तिरूप ही रह गया, अर्थात् विनष्ट हो चुका है, और वह भी स्मृति से प्रकाशित नहीं होता
क्योंकि एक ज्ञान दूसरे ज्ञान से नहीं जाना जा सकता है, न रहने के कारण; इसलिए कि अर्थ का
प्रकाशन न होने से, “इदं स्मरामि” मैं यह स्मरण करता हूँ—यह ज्ञान भ्रान्तिमात्र है । अतः
फिर भी वही बात आ जायेगी, तब उसके प्रति कहा जाता है—
[ वह महेश्वर भगवान् चिदात्मा तबतक स्मृति में अर्थ को विकल्पित करता है और ऐसा
मानने पर उस अर्थ का पूर्व देश-काल के द्वारा अवच्छेद होने के कारण इसी से देश-काल संकोच
वशात् पदार्थ के रूप का परामर्श करता है यही इसका निचोड़ है और परामर्श भी परमार्थरूप
ही है अर्थात् दूसरा कोई नहीं है, अप्रकाशमानता रहने पर क्या परामर्श होगा ? वह अप्रकाशित
है और परामृष्ट भी है ऐसा बोलना अन्धे का बोलना जैसा ही प्रायः है । परामर्श ही प्रकाशक
स्वभाववाला है, स्वभाववाले के न रहने से किसका स्वभाव होगा, इसलिए कहिये—परामर्श
हेतु से या परामर्श के उपलक्षण से उस स्वलक्षण का अवश्य रहना मानना पड़ेगा । अर्थात् सामर्थ्य
होने से परामर्श के बिना अन्यथा नहीं बन सकता, घटाभास हो अकेला या लाल-पीला, ऊँचा-
नीचा, छोटा-बड़ा आदि आभास के सम्बन्ध से या वह सब पूर्वाभास से युक्त होकर बहुत प्रकाश
से भासित होता है, सब कुछ वह देश-काल के आभास के भेद से अपना स्वरूप ही है । यदि तुम
कहो कि पूर्व वाला ही अर्थ प्रकाशित होता हो, तो उस अनुभव से कौन सा भेद है, कौन इस
प्रकार कहता है कि प्रकाशित होता है । अरे ! वह प्रकाशित होता है वही पूर्व का काल इसके
वेद्य को स्वीकार करनेवाले अवभास अंश में अपने लक्षण का कारण है और इस समय में भी
स्मर्ता के देह, प्राण आदि से होनेवाला वर्तमान काल विमर्श भाग में भासता है, यही दोनों काल
का स्पर्शन उस विमर्श का हेतु है । ]
स्मृति काल में अर्थ सामर्थ्य से युक्त होकर पूर्व अवभासित स्वलक्षणरूप अर्थ को विमर्शन
करता हुआ अखिलाभास से मिश्रित वपु केवल घटाभासतया भासित होगा ॥ २ ॥